जीजीयू के 72 कर्मचारियों का 15 साल का संघर्ष जारी: हाईकोर्ट–सुप्रीम कोर्ट में जीत के बाद भी नियमितीकरण अधर में

बिलासपुर(छत्तीसगढ़ उजाला)-विश्वविद्यालय में एलडीसी और एमटीएस पदों पर कार्यरत ये कर्मचारी वर्ष 1997 से दैनिक वेतनभोगी के रूप में सेवाएं दे रहे थे। विश्वविद्यालय के सेंट्रल यूनिवर्सिटी बनने के बाद शासन के सामान्य प्रशासन विभाग के आदेश और 5 मार्च 2008 एवं 26 अगस्त 2008 के विश्वविद्यालय आदेश के आधार पर सभी कर्मचारियों को नियमित कर वेतनमान दिया गया था।
मार्च 2009 तक उन्हें नियमित वेतनमान प्राप्त हुआ, लेकिन अप्रैल 2009 से बिना किसी लिखित आदेश व सूचना के विश्वविद्यालय प्रशासन ने इन्हें दोबारा दैनिक वेतनभोगी मानते हुए भुगतान शुरू कर दिया।
15 साल की लंबी लड़ाई, अदालतों में कर्मचारी जीतते रहे…
पर आदेश आज तक नहीं हुआ लागू
कर्मचारियों ने इस निर्णय को हाईकोर्ट में चुनौती दी। 6 मार्च 2023 को हाईकोर्ट ने कर्मचारियों के पक्ष में निर्णय सुनाते हुए 26 अगस्त 2008 से नियमितिकरण का लाभ देने का आदेश दिया।
इसके बाद विश्वविद्यालय ने डिवीजन बेंच और सुप्रीम कोर्ट तक अपीलें दायर कीं, लेकिन दोनों जगह उसकी याचिकाएं खारिज हो गईं।
कर्मचारियों के मुताबिक, हाईकोर्ट के आदेश के बाद भी विश्वविद्यालय ने सुप्रीम कोर्ट में रिव्यू पिटीशन दाखिल की, जिसे 12 फरवरी 2025 को सुप्रीम कोर्ट ने भी खारिज कर दिया। इसके बावजूद विश्वविद्यालय ने अब तक आदेशों का पालन नहीं किया है।
8 कर्मचारियों की मौत, 18 की सेवा समाप्त… फिर भी लाभ नहीं
कर्मचारियों ने बताया कि 15 वर्षों की इस लड़ाई में 8 कर्मचारी दम तोड़ चुके हैं।
वहीं 31 मई 2025 को सेवा निवृत्ति आयु पूरी होने पर 18 कर्मचारियों को बिना आदेश और बिना किसी वित्तीय लाभ के सेवा से हटा दिया गया।उन्हें न पेंशन मिली है, न प्रोविडेंट फंड की राशि।
कर्मचारियों का कहना है कि शीर्ष न्यायालयों के स्पष्ट आदेशों की अनदेखी कर विश्वविद्यालय प्रशासन न्यायिक अवमानना कर रहा है। इस मामले में दायर अवमानना याचिकाएं अभी भी लंबित हैं।
विश्वविद्यालय की तरफ से क्या कहा गया
जीजीयू मीडिया प्रभारी प्रो. मनीष श्रीवास्तव ने बताया कि 1997 से दैनिक वेतनभोगी कर्मचारियों के नियमितिकरण का मामला हाईकोर्ट से सुप्रीम कोर्ट तक चल चुका है।
उन्होंने कहा कि विश्वविद्यालय ने सुप्रीम कोर्ट में क्यूरेटिव पिटीशन दायर की है और उसका निर्णय आने के बाद ही आगे की प्रक्रिया की जाएगी।
कर्मचारियों की पीड़ा: “हम न्याय के लिए भटकते रह गए”
कर्मचारियों का कहना है कि 15 वर्षों की कानूनी लड़ाई, आर्थिक तंगी और रोजगार असुरक्षा ने उनकी स्थिति बदतर कर दी है।
उन्होंने कोर्ट से जल्द न्याय दिलाने की फिर अपील की है।



