“सावरकर भवन में सावरकर उपेक्षित: नेताओं की बयानबाज़ी भारी, सम्मान हल्का”

बात बेबाक
✍️ चंद्रशेखर शर्मा (पत्रकार) — 9425522015**
“हैलो मंत्री जी, मैं सावरकर बोल रहा हूँ…
फाइलें बदलती हैं, कुर्सियाँ बदलती हैं, अध्यक्ष बदलते हैं—
पर मेरी जगह क्यों नहीं?”
शहर के मध्य स्थित वीर सावरकर भवन के एक अंधियारे, वीरान कोने में खरपतवारों के बीच उपेक्षित पड़ी विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) की मूर्ति अपने स्थापना काल से ही नर्सिंग कॉलेज की तरफ बेबस निगाहें टिकाए आज भी खड़ी है।
नगरपालिका में बीच के वर्षों में चार-चार भाजपाई अध्यक्ष बदल गए—एक कांग्रेसी अध्यक्ष भी आया—पर मूर्ति का सम्मानजनक स्थानांतरण आज तक फाइलों में कैद है।
पुराने अध्यक्ष और इंजीनियर फंड की कमी का रोना रोते-रोते कुर्सियाँ छोड़ गए, कुछ रिटायर हो गए, नए पदस्थ हो गए… मगर वीर सावरकर के सम्मान के लिए बजट आज तक “अज्ञातवास” में है।
ये शहर के लिए शर्म की बात है कि भारत माता चौक — महामाया मंदिर — अंबेडकर चौक जैसे प्रमुख स्थलों के बीच स्थित वीर सावरकर भवन के एक धूल-धूसरित कोने में महान स्वतंत्रता संग्राम सेनानी की मूर्ति अनदेखी की मार झेलते हुए आज भी वही खड़ी है।
“मेरा ट्रांसफ़र ऑर्डर आख़िर किस फाइल में अटका है?”
ऐसा प्रतीत होता है जैसे मूर्ति पूछ रही हो—
“कभी सामने की ओर सम्मानजनक स्थान दिला दो…!
मेरे लिए फंड कब स्वीकृत होगा?
कम से कम मेरा चोरी हुआ चश्मा ही वापस दिला दो नेता जी…
क्या इसके लिए भी किसी बड़े नेता की सिफारिश चाहिए?”
चार अध्यक्ष बदले—पर सावरकर की किस्मत नहीं बदली
सालों में न राजनीतिक इच्छा शक्ति बदली, न रवैया।
सावरकर के नाम पर राजनीति करने वाले नेता साल में बस एक दिन आते हैं—
जलाभिषेक, माल्यार्पण, भाषण, फोटो, पोस्टर—
और ‘सावरकर सम्मान’ निभाकर चले जाते हैं।
भाषणों में सम्मान ज़िंदा रखते हैं,
पर ज़मीन पर सावरकर बेबस और उपेक्षित।
कांग्रेस और बीजेपी दोनों के नेताओं की बयानबाज़ी चुनावी मौसम में तेज़ हो जाती है,
पर सावरकर भवन का कोना आज भी वैसा ही अंधेरा और अनदेखा।
अगर आज सावरकर होते…
अपनी ही तस्वीर पर पड़े धूल और अनदेखी को देखकर शायद कह देते—
“क्या मैंने इसी दिन के लिए कालापानी की सज़ा काटी थी…?”
मूर्ति की व्यथा — व्यंग्य में लिपटा सच
सावरकर की मूर्ति कहती हुई महसूस होती है—
“बेटा, इतने सालों से नर्सिंग कॉलेज की छात्राओं को पढ़ते, पास होते देखते-देखते
अब तो मुझे भी ऑनररी नर्सिंग डिप्लोमा मिल जाना चाहिए!”
शहर में बहस फिर से शुरू हुई है कि मूर्ति को सम्मानजनक स्थान दिया जाए।
लेकिन राजनीतिक गलियारों का अनुभव कहता है—
“बहस के चार चक्र पूरे होते-होते पाँचवा अध्यक्ष भी बन जाएगा,
और मूर्ति फिर भी वहीं की वहीं खड़ी रहेगी।”
यह मूर्ति सिर्फ एक प्रतिमा नहीं,
बल्कि शहर की राजनीतिक टाइमलाइन की अचल, शांत और कटु गवाही बन चुकी है।
चलते-चलते सवाल…
क्या यह सच है कि कोतवाली क्षेत्र के गंगानगर जुआ कांड में
खिलाड़ी तो एक फोन पर बच निकले,
लेकिन ज़ब्त की गई 9,000 रुपये की रकम रहस्यमय तरीके से गायब हो गई?
और अंत में—एक तीर, कई निशाने
मूर्ति खड़ी है बगल में, पर नज़र से ओझल,
राजनीति की धूप में सच्चाई भी कल झुलस गई।
चुनावी नारे—बड़े-बड़े भाषण—सबका यही खेल रहा,
इतिहास को धूल में दबा दिया,
मतलबपरस्ती का तमाशा पूरा हुआ।
जय_हो
26 नवंबर 2025 — कवर्धा (कबीरधाम)




