
रायपुर(छत्तीसगढ़ उजाला)-रामकृष्ण केयर हॉस्पिटल में सेप्टिक टैंक में दम घुटने से 3 सफाईकर्मियों की दर्दनाक मौत के बाद प्रशासन का रवैया सवालों के घेरे में है। जांच ठंडे बस्ते में डाल दी गई है और जिम्मेदारों पर अब तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई है।
राष्ट्रीय सफाई कर्मचारी आयोग के उपाध्यक्ष हरदीप सिंह गिल ने अस्पताल का निरीक्षण किया, लेकिन कड़ी कार्रवाई के बजाय सिर्फ 2 मिनट का मौन रखकर लौट गए।
टैंक में क्यों उतारे गए मजदूर? सवाल अब भी अनुत्तरित
सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिर सफाईकर्मियों को बिना सुरक्षा के टैंक में क्यों उतारा गया?
कानून के मुताबिक ऐसा करवाना गंभीर अपराध है और इसमें गिरफ्तारी का प्रावधान है, लेकिन प्रशासन इस मुद्दे पर चुप्पी साधे बैठा है।
निरीक्षण हुआ, लेकिन ‘एक्शन’ गायब
घटना के बाद हरदीप सिंह गिल रायपुर पहुंचे।
परिजनों से मुलाकात की,अस्पताल का निरीक्षण किया
गैस रिसाव और सुरक्षा इंतजामों पर सवाल उठाए
लेकिन अंत में नतीजा सिर्फ चेतावनी तक सीमित रहा। कड़ी कार्रवाई की उम्मीद लगाए बैठे लोगों को निराशा हाथ लगी।
वादे कुछ और, जमीन पर कुछ और
परिजनों से मुलाकात के दौरान सख्त कार्रवाई का भरोसा दिया गया था, लेकिन अस्पताल निरीक्षण के बाद सुर बदलते नजर आए।
यहां तक कि सरकारी विज्ञप्ति में भी अस्पताल का नाम तक नहीं लिया गया—सिर्फ “निजी हॉस्पिटल” कहकर मामला हल्का करने की कोशिश दिखी।
सुप्रीम कोर्ट की गाइडलाइन का खुला उल्लंघन
Supreme Court of India ने 2013 में मैनुअल,स्कैवेंजिंग पर पूरी तरह प्रतिबंध लगाया था।
यह अपराध संज्ञेय और गैर-जमानती है
उल्लंघन पर कड़ी कार्रवाई अनिवार्य है
इसके बावजूद इस मामले में अब तक कोई सख्त कदम नहीं उठाया गया।
मुआवजा मिला, मामला शांत?
अस्पताल प्रबंधन ने मृतकों के परिजनों को 30-30 लाख रुपये मुआवजा देने का ऐलान किया है।
प्रशासन भी राहत और मुआवजे पर फोकस करता दिखा, जिससे ऐसा लग रहा है कि मामला “सेटल” करने की कोशिश हो रही है।
बैठक में बड़े निर्देश, जमीन पर असर शून्य
रेडक्रॉस सभाकक्ष में हुई बैठक में कई बड़े निर्देश दिए गए—
PPE किट अनिवार्य
हर 6 महीने में मेडिकल जांच
न्यूनतम वेतन लागू
जागरूकता अभियान
लेकिन सवाल वही—क्या इन निर्देशों का पालन होगा?
कागजों में सख्ती, जमीन पर नरमी
FIR में एट्रोसिटी एक्ट जोड़ने की बात
PM आवास देने के निर्देश
सुरक्षा इंतजाम मजबूत करने के आदेश
सब कुछ कागजों में सख्त दिख रहा है, लेकिन जमीनी कार्रवाई अब भी नदारद है।
मौत के बाद भी सिस्टम नहीं जागा
3 जिंदगियां चली गईं, लेकिन जिम्मेदार अब भी खुले हैं।
मौन, मीटिंग और मुआवजा—यही इस पूरे मामले की कहानी बनकर रह गई है।




