गौरेला पेंड्रा मरवाहीछत्तीसगढ

3.01 करोड़ के टेंडर पर बवाल: फर्जी दस्तावेज़ के आरोपों में घिरे ठेकेदार हितेश सूर्यवानी, नोटिस के बाद भी मरवाही के अधिकारियों की चुप्पी


जिला पंचायत भवन निर्माण टेंडर पर उठे गंभीर सवाल, ठेकेदारों ने टेंडर समिति पर लगाया संगठित गिरोह की तरह काम करने का आरोप
गौरेला–पेंड्रा–मरवाही(छत्तीसगढ़ उजाला)
जिले में जिला पंचायत भवन निर्माण के 3.01 करोड़ रुपये के टेंडर को लेकर बड़ा विवाद खड़ा हो गया है। ठेकेदार हितेश सूर्यवानी के खिलाफ थाना पेंड्रा में लिखित शिकायत दर्ज कराई गई है। शिकायत में आरोप लगाया गया है कि संदिग्ध अनुभव प्रमाण पत्र और पूर्णता प्रमाण पत्र के आधार पर टेंडर हासिल करने की कोशिश की गई। मामला सामने आते ही प्रशासनिक और राजनीतिक हलकों में हलचल मच गई है।
फर्जी प्रमाण पत्र से टेंडर हासिल करने का आरोप
शिकायतकर्ता का आरोप है कि टेंडर प्रक्रिया में लगाए गए अनुभव प्रमाण पत्र और पूर्णता प्रमाण पत्र की सत्यता संदिग्ध है। आरोप यह भी है कि इन दस्तावेजों का न तो स्वतंत्र तकनीकी सत्यापन किया गया और न ही नियमों के अनुसार जांच, इसके बावजूद टेंडर प्रक्रिया को आगे बढ़ा दिया गया।
यदि जांच में आरोप सही पाए जाते हैं तो यह मामला केवल प्रशासनिक लापरवाही नहीं बल्कि गंभीर आपराधिक कृत्य की श्रेणी में आ सकता है। करोड़ों की सार्वजनिक राशि से जुड़ी इस परियोजना में संभावित गड़बड़ी ने टेंडर प्रणाली की पारदर्शिता पर बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है।
अधीक्षण अभियंता ने जारी किया नोटिस
मामला सामने आने के बाद ग्रामीण यांत्रिकी सेवा बिलासपुर के अधीक्षण अभियंता विनोद कुमार मिंज ने मरवाही के कार्यपालन अभियंता को कारण बताओ नोटिस जारी किया। नोटिस में पूछा गया कि टेंडर में लगाए गए अनुभव प्रमाण पत्रों की तकनीकी जांच क्यों नहीं कराई गई और नियमों की अनदेखी करते हुए वित्तीय प्रस्ताव (फाइनेंशियल बिड) कैसे खोल दिया गया।
नोटिस के बाद भी जवाब नहीं
चौंकाने वाली बात यह है कि नोटिस जारी होने के बाद भी मरवाही के कार्यपालन अभियंता की ओर से अब तक कोई जवाब प्रस्तुत नहीं किया गया है। इस चुप्पी ने पूरे मामले को और संदिग्ध बना दिया है तथा विभागीय कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े कर दिए हैं।
ठेकेदारों का आरोप—टेंडर समिति कर रही संगठित खेल
इसी बीच जिले के कई ठेकेदारों ने भी टेंडर प्रक्रिया पर गंभीर आरोप लगाए हैं। ठेकेदारों का कहना है कि मरवाही में टेंडर समिति संगठित गिरोह की तरह काम कर रही है, जिससे शासन को भारी आर्थिक नुकसान हो रहा है।
ठेकेदारों के अनुसार अन्य संभागों में जब टेंडर होते हैं तो प्रतिस्पर्धा के कारण 24 से 25 प्रतिशत तक नीचे (बिलो) रेट पर काम हो जाता है, जिससे सरकार की अच्छी खासी बचत होती है। लेकिन मरवाही में योग्य ठेकेदारों को तकनीकी कारणों से रिजेक्ट करने का खेल किया जाता है और बाद में सिर्फ 1 से 2 प्रतिशत बिलो रेट पर ही काम दे दिया जाता है।
ठेकेदारों का आरोप है कि इस पूरी प्रक्रिया में मनमानी और पैसे के लेन-देन की शिकायतें भी सामने आई हैं, जिससे टेंडर प्रक्रिया की पारदर्शिता पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं।
मंत्री स्तर तक पहुंची शिकायत
सूत्रों के अनुसार इस पूरे मामले की शिकायत मंत्री स्तर तक भी पहुंच चुकी है। शिकायत में टेंडर प्रक्रिया की उच्च स्तरीय जांच कराने और जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई की मांग की गई है।
एफआईआर की मांग
शिकायतकर्ता ने पुलिस से मांग की है कि प्रस्तुत दस्तावेजों की निष्पक्ष और तकनीकी जांच कराई जाए तथा आरोप सही पाए जाने पर संबंधित ठेकेदार के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धाराओं के तहत एफआईआर दर्ज की जाए।
अब सबकी नजर कार्रवाई पर
3.01 करोड़ रुपये की इस परियोजना में लगे आरोपों ने पूरे प्रशासनिक तंत्र को कठघरे में खड़ा कर दिया है। अब सबकी नजर पुलिस जांच और विभागीय कार्रवाई पर टिकी है।
यदि आरोपों में सच्चाई सामने आती है तो यह मामला न केवल करोड़ों के टेंडर में बड़े खेल की ओर इशारा करेगा बल्कि जिले की टेंडर प्रणाली की पारदर्शिता और जवाबदेही पर भी गंभीर प्रश्नचिह्न लगा देगा।
फिलहाल सवाल यही है—क्या यह सिर्फ ठेकेदारों के बीच प्रतिस्पर्धा का विवाद है या फिर 3.01 करोड़ के टेंडर में सचमुच कोई बड़ा खेल छिपा हुआ है?

प्रशांत गौतम

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