मुकेश चंद्राकर के बाद अब किसकी बारी?
मैकल में पत्रकारों की हत्या की साजिश — “समाजसेवी” मुखौटे के पीछे छिपे माफिया बेनकाब

गौरेला–पेंड्रा–मरवाही (छत्तीसगढ़ उजाला)
छत्तीसगढ़ में सच लिखना अब साहस नहीं, जान हथेली पर रखने जैसा अपराध बनता जा रहा है।
बस्तर में पत्रकार मुकेश चंद्राकर की हत्या की गूंज अभी थमी भी नहीं थी कि अब अमरकंटक–मैकल पर्वत श्रृंखला में अवैध खनन की पोल खोल रहे पत्रकारों को सुनियोजित तरीके से मौत के मुंह में धकेलने की कोशिश सामने आई है।
अवैध खनन की रिपोर्टिंग बनी जानलेवा
8 जनवरी की शाम, जब पत्रकार सुशांत गौतम और उनके सहयोगी रितेश गुप्ता मैकल क्षेत्र में अवैध खनन पर ग्राउंड रिपोर्टिंग कर लौट रहे थे, तब उन पर पूर्व नियोजित घातक हमला किया गया।
इस हमले के पीछे जिन तीन नामों का खुलासा हुआ है, वे वर्षों से क्षेत्र में खनन गतिविधियों से जुड़े बताए जा रहे हैं —
जयप्रकाश शिवदासानी (जेठू)तथाकथित समाजसेवी , ललन तिवारी और सुनील बाली।
सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि जयप्रकाश शिवदासानी (जेठू) शहर में खुद को “समाजसेवी” के रूप में प्रस्तुत करता रहा है।
लेकिन अब उसी समाजसेवी चेहरे के पीछे की हिंसक और आपराधिक सच्चाई सामने आ रही है।
तीन गाड़ियों से घेराबंदी — हत्या की पूरी स्क्रिप्ट तैयार
प्रत्यक्ष विवरण के अनुसार —
आगे से जयप्रकाश शिवदासानी (जेठू) की कार ने रास्ता रोका
साइड में ललन तिवारी का हाइवा ट्रक खड़ा किया गया
पीछे से सुनील बाली की फोर-व्हीलर ने घेराबंदी पूरी की
यह कोई संयोग नहीं, बल्कि तीनों की सुनियोजित हत्या की साजिश थी।
लोहे की रॉड से हमला — कांच तोड़ा, खून बहाया
हमलावरों ने लोहे की रॉड से ड्राइवर साइड का कांच तोड़ा।
टूटे कांच के टुकड़े पत्रकार सुशांत गौतम के चेहरे और माथे में धंस गए, जिससे वे गंभीर रूप से घायल हुए और खून बहने लगा।
अगर उस वक्त सुशांत और रितेश गाड़ी से बाहर उतरते,
तो आज यह खबर हमले की नहीं बल्कि दो पत्रकारों की हत्या की होती।
मोबाइल छीना गया — सबूत मिटाने की कोशिश
हमलावरों ने रितेश गुप्ता का मोबाइल जबरन छीनकर बंद कर दिया।
सुशांत के फोन के साथ भी हाथापाई की गई।
यह साफ संकेत है कि — 👉 मकसद सिर्फ डराना नहीं था
👉 वीडियो, फोटो और साक्ष्य मिटाकर सच को दबाना था
FIR दर्ज, लेकिन कार्रवाई पर सवाल
गौरेला थाना में FIR क्रमांक 0014/2026 दर्ज की गई है।
मामले में —हत्या की कोशिश,खतरनाक हथियार से हमला,आपराधिक धमकी,आपराधिक साजिश
जैसी गंभीर धाराएं लगाई गई हैं।
लेकिन बड़ा सवाल यही है — क्या “समाजसेवी” बने जयप्रकाश शिवदासानी (जेठू), ललन तिवारी और सुनील बाली पर सख्त कार्रवाई होगी?
या यह मामला भी दबाव, रसूख और समझौते की भेंट चढ़ा दिया जाएगा?
समझौते का दबाव — माफिया का पुराना खेल
हमले के बाद पत्रकारों पर समझौते का दबाव बनाया जा रहा है।
लेकिन सवाल सीधा है —अगर हत्या हो जाती,तो क्या लाश से भी समझौता कराया जाता?
मुकेश चंद्राकर से मैकल तक — वही पैटर्न सच उजागर करो
माफिया के धंधे पर चोट करो और फिर पत्रकार को खत्म करने की कोशिश
बस्तर में मुकेश चंद्राकर मैकल में सुशांत गौतम और रितेश गुप्ता
पैटर्न वही है, चेहरे बदल गए हैं।
“शांत जिला” पर काला धब्बा
गौरेला–पेंड्रा–मरवाही हमेशा शांत जिले के रूप में जाना गया है।
लेकिन इस हमले ने जिले के इतिहास पर काला धब्बा लगा दिया है।
अब जरूरत है —तुरंत गिरफ्तारी,सख्त धाराओं में चार्जशीट और यह संदेश कि पत्रकार पर हाथ उठाने की कीमत बहुत भारी पड़ेगी
अब सवाल पूरे देश से
मुकेश चंद्राकर के बाद अब किसकी बारी?
सुशांत गौतम?
रितेश गुप्ता?
या फिर हर वो पत्रकार जो सच लिखने की हिम्मत करता है?
👉 यह हमला सिर्फ पत्रकारों पर नहीं है
👉 यह लोकतंत्र, प्रेस की आज़ादी और सुशासन पर हमला है




