“राम, गांधी और नाम की राजनीति: कवर्धा से दिल्ली तक सियासी नौटंकी”

बात बेबाक
✍️ चंद्र शेखर शर्मा (पत्रकार)
📞 9425522015
आजकल भक्त और चमचे नामक प्रजातियों के बीच नाम और नामकरण को लेकर ज़ुबानी और पुतलाई जंग छिड़ी हुई है। सड़क से लेकर स्टेडियम, शहरों से होते हुए योजनाओं तक—नाम रखने और बदलने का खेल बदस्तूर जारी है। सरकार चाहे कांग्रेसी हो या भाजपाई, कवर्धा से दिल्ली तक यह नामी जंग चर्चा का विषय बनी हुई है।
राम-राम की रट लगाए चमचे भक्त नाम बदलने के आरोप लगाकर नेतागिरी चमकाने में जुटे हैं। नरेगा से महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना बनी यह योजना कब शॉर्टकट के चक्कर में “महात्मा” को गायब कर सिर्फ मनरेगा रह गई—किसी को पता नहीं। अब उसी योजना का मनरेगा से जी-राम-जी तक का सफर तय होना नेतागिरी का नया हथियार बन गया है।
विपक्षी सरकार को घेरने के लिए राम नाम का इस्तेमाल हो रहा है। उधर, गांधीवादी नेताओं को गांधी जी का नाम खतरे में दिखाई दे रहा है—मानो महात्मा गांधी कोई राजनीतिक जीवन बीमा पॉलिसी हों। हकीकत यह है कि गांधी जी के नाम का जितना राजनीतिक इस्तेमाल कांग्रेस ने नहीं किया, उससे कहीं ज़्यादा मौजूदा सत्ता ने किया—फिर भी भक्त कह रहे हैं,
“अरे मियाँ, एक योजना का नाम ही तो राम जी के नाम पर रखा है, वो भी तो गांधी के ही राम थे।”
जो लोग कल तक महात्मा गांधी को शॉर्टकट में उड़ा चुके, आज उनके आराध्य के नाम पर जी-राम-जी कर देने को छोटा सा काम बता रहे हैं। सवाल पूछते हैं—
“कौन सा देश लूट लिया? आखिर नाम में रखा ही क्या है?”
नाम को हल्के में लेने वालों को शेक्सपियर चच्चा याद आ जाते हैं—
“नाम में क्या रखा है?”
गुलाब को कुछ भी कहो, खुशबू वही रहती है।
काश! शेक्सपियर चच्चा आज कवर्धा से दिल्ली तक दौड़ लगा आते। तब उन्हें पता चलता कि नाम में ही सब कुछ रखा है। शब्दों की ज़रा-सी हेरफेर दिन में तारे दिखा देती है। यकीन न हो तो किसी दिन अपनी बेगम से
“आज तुम बहुत कातिल लग रही हो”
की जगह
“आज तुम हत्यारिन लग रही हो”
कहकर देख लीजिए—दिन में तारे भी दिखेंगे और ज्ञानचक्षु भी खुल जाएंगे।
इधर कटते जंगल, ढहते पहाड़, अडानीस्तान बनते प्रदेश के आरोप, जल-जंगल-जमीन बचाने के संघर्ष—इन सबके बीच किसी कोने में दबी पड़ी खबरें या प्राइम टाइम से गायब सच्चाइयाँ अपना दम तोड़ रही हैं। इसी दौरान महिला पुलिसकर्मी की इज़्ज़त तार-तार करने वाली दुखद घटना छत्तीसगढ़ पुलिस और सरकार पर बदनुमा दाग बनकर खड़ी है—जो कब धुलेगा, पता नहीं।
लेकिन इन सब गंभीर मुद्दों के बीच नेता नाम-नाम के खेल में उलझे हुए हैं—गांधी और गांधी के जी-राम-जी के बीच। इस कुकुरबिल्ली की लड़ाई में अफसरों की पौ-बारह हो गई है।
चूहे बेचारों को ज़बरन बदनाम किया जा रहा है।
धान को चूहों से बचाने के नाम पर करोड़ों की चूहामार दवाइयाँ, पिंजरे और न जाने क्या-क्या खरीदा गया। अफसरों ने इन्हीं बिलों से बीवियों के महंगे शौक पूरे किए, बच्चों का भविष्य संवारा—और अब करोड़ों का धान चूहों ने खा लिया कहकर गबन का इतिहास रच दिया।
यानी गबन सिंह का नाम बदलकर चूहा सिंह कर दिया गया।
जो लोग “नाम में क्या रखा है” का ज्ञान बाँटते फिरते हैं, उन्हें गबन सिंह और चूहा राम से बेहतर उदाहरण कहीं नहीं मिलेगा। अगर नाम में कुछ नहीं रखा होता, तो योजनाएँ, पुरस्कार और भवन चुनिंदा लोगों के नाम पर ही क्यों रखे जाते? कभी गोबरहिन टुरी टाइप लोगों के नाम पर भी रखकर दिखाइए।
खैर, शेक्सपियर चच्चा कुछ भी कहें—
नाम में बहुत कुछ रखा है।
असल समस्या विपक्ष को RAM नाम से है। विधेयक संसद से पारित हो चुका है, अब राम नाम जुड़ चुका है। आदतन तकलीफ़ तो कुछ लोगों को होनी ही थी। प्रियंका वाड्रा को भी तकलीफ़ थी कि विधेयक संसद में बिना चर्चा के पास हो गया। बात गलत है, लेकिन जब विपक्ष संसद को ठप करने की नियति से बहिर्गमन करता रहेगा, तो ऐसे ही बिल पारित होते रहेंगे।
चलते-चलते
पुलिस विभाग में आखिर मुखबिर मामा कौन है?
क्यों उनके नाम की इतनी चर्चा है?
क्या पद का फायदा उठाकर मुखबिर के नाम पर सरकारी खजाने को चूना लगाया जा रहा है?
या फिर मुखबिर मामा सिर्फ़ अफ़वाह हैं—या कोई कड़वी सच्चाई?
और अंत में
ख़बर छुपाई जाती है, अफ़वाह उड़ाई जाती है,
यह वो ज़माना है—
जहाँ कहानी कुछ और होती है,
और सुनाई कुछ और जाती है।
#जय_हो
11 जनवरी 2026 | कवर्धा (छत्तीसगढ़)



