
रायपुर(छत्तीसगढ़ उजाला)
छत्तीसगढ़ में आदिवासी भूमि अधिकारों से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में 18 वर्षों बाद न्याय मिला है। रायपुर संभाग के संभागायुक्त श्री महादेव कावरे ने खमतराई स्थित भूमि नामांतरण प्रकरण में बड़ा फैसला सुनाते हुए अनुविभागीय अधिकारी (रा.) रायपुर के आदेश को निरस्त कर दिया है।
संभागायुक्त न्यायालय ने छत्तीसगढ़ भू-राजस्व संहिता, 1959 की धारा 44(2) के अंतर्गत दायर अपील को स्वीकार करते हुए स्पष्ट किया कि स्वत्व के बिना किया गया विक्रय विधिसम्मत नहीं है और ऐसे विक्रय से क्रेता को कोई वैधानिक अधिकार प्राप्त नहीं हो सकता।
क्या है पूरा मामला
यह अपील श्यामसुंदर सिंह (पिता स्व. रामनारायण सिंह) एवं शारदा सिंह (पिता रामनारायण सिंह), निवासी भनपुरी, रायपुर द्वारा प्रवीण कुमार अग्रवाल, निवासी शैलेन्द्र नगर, रायपुर के विरुद्ध प्रस्तुत की गई थी।
अपील अनुविभागीय अधिकारी रायपुर द्वारा 31 जुलाई 2017 को पारित आदेश के विरुद्ध दायर की गई थी।
विवाद ग्राम खमतराई स्थित खसरा नंबर 125/2 एवं 125/9, कुल रकबा 0.405 हेक्टेयर भूमि को लेकर था। अपीलार्थियों का कहना था कि उक्त भूमि का पूर्व में विधिवत विक्रय आदिवासी गोंड जाति के व्यक्ति के पक्ष में हो चुका था, ऐसे में बाद में बिना स्वामित्व किए गए किसी भी विक्रय से उत्तरवादी को कोई अधिकार नहीं मिल सकता।
न्यायालय की अहम टिप्पणियां
संभागायुक्त न्यायालय ने अपने आदेश में कहा कि—
स्वत्व के बिना किया गया विक्रय शून्य (अवैध) है
ऐसे विक्रय से क्रेता को कोई कानूनी लाभ नहीं मिल सकता
अनुविभागीय अधिकारी द्वारा तहसीलदार को प्रकरण प्रत्यावर्तित करना धारा 49(3) के विपरीत है, क्योंकि इस धारा के अंतर्गत प्रत्यावर्तन स्पष्ट रूप से वर्जित है
अंतिम निर्णय
सभी दस्तावेजों, तर्कों एवं विधिक प्रावधानों के गहन परीक्षण के बाद न्यायालय ने यह निष्कर्ष निकाला कि अनुविभागीय अधिकारी रायपुर का आदेश विधिसम्मत नहीं है।
फलस्वरूप, 29 दिसंबर 2025 को खुले न्यायालय में अपील स्वीकार करते हुए एसडीओ का आदेश पूरी तरह निरस्त कर दिया गया।
महत्वपूर्ण संदेश
यह फैसला न केवल आदिवासी भूमि अधिकारों की रक्षा की दिशा में मील का पत्थर माना जा रहा है, बल्कि यह भी स्पष्ट करता है कि राजस्व मामलों में कानून की अनदेखी कर पारित आदेश न्यायिक समीक्षा में टिक नहीं सकते।




