छत्तीसगढ

सियासत……पूर्व मुख्यमंत्री बघेल का विवादित बयान….उपमुख्यमंत्री को कहा बंदर……मंत्री टंकराम वर्मा का भूपेश को करारा जवाब….

छत्तीसगढ़ उजाला

रायपुर।छत्तीसगढ़ की सत्ता में अब नेताओं का विवाद जानवरो की संज्ञा देने तक पहुँच गया हैं।सत्ता और विपक्ष का लड़ना जरूरी भी है पर इस हद तक आकर बयानबाजी करना ओछापन ही कहा जायेगा।कांग्रेस के दिग्गज नेता भूपेश बघेल के उप मुख्यमत्री अरुण साव की तुलना बंदर से कर दी।जिसको लेकर अब भाजपा भी सामने आकर बयान जारी की।भूपेश बघेल के इस बयान पर मंत्री टंक राम वर्मा ने कहा कि पूर्व मुख्यमंत्री को ऐसी भाषा शोभा नहीं देती. ऐसे शब्दों का इस्तेमाल नहीं करना चाहिए. कांग्रेस चुनावी झटके से विचलित होकर आपस में ही लड़ रही है. इसी वजह से लगातार विवादित बयान सामने आ रहे।

पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने तीन दिन पहले बिलासपुर के लिंगियाडीह में लोगों को संबोधित करते हुए उप मुख्यमंत्री अरुण साव की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाया था. उन्होंने उप मुख्यमंत्री साव की तुलना केवल उछल-कूद करने वाले बंदर से करते हुए कहा कि वे दो साल में केवल 950 मीटर सड़क बनवा पाए हैं, और किसी भी मामले में कोई काम नहीं कर पा रहे. इसी बयान पर मंत्री टंकराम वर्मा ने मीडिया से चर्चा में पलटवार किया है.अब इस बयान पर छत्तीसगढ़ में चर्चाओं का दौर शुरू हो गया है।छत्तीसगढ़ की राजनीति में पहले ऐसा नही होता था जो आज के समय मे नजर आ रहा है।प्रदेश की राजनीति में अब नेताओं का जूतमपैजार होना ही बाकी रह गया है।

आज की राजनीति में वैचारिक मतभेदों से ज़्यादा व्यक्तिगत आरोप-प्रत्यारोप और आपसी खींचतान हावी होती दिख रही है। सत्ता की दौड़ में कई नेता जनहित के मुद्दों—जैसे शिक्षा, स्वास्थ्य, रोज़गार और महँगाई—से ध्यान हटाकर एक-दूसरे को नीचा दिखाने में ऊर्जा लगा रहे हैं। इससे न केवल लोकतांत्रिक विमर्श कमजोर होता है, बल्कि जनता का राजनीति से विश्वास भी डगमगाता है। विरोध का अधिकार लोकतंत्र की आत्मा है, पर जब विरोध व्यक्तिगत दुश्मनी में बदल जाए, तो व्यवस्था को नुकसान पहुँचता है।
राजनीति का स्तर उठाने के लिए ज़रूरी है कि नेता मुद्दों पर आधारित बहस करें, शालीन भाषा अपनाएँ और जवाबदेही स्वीकार करें। साथ ही जनहित पर बहस करे। तभी राजनीति फिर से सेवा, समाधान और संवाद का माध्यम बन सकेगी।

Anil Mishra

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