संजू त्रिपाठी हत्याकांड में बड़ा फैसला: सभी 22 आरोपी बरी, पुलिस ने भाई कपिल त्रिपाठी को बताया था मुख्य साजिशकर्ता

दो चश्मदीद गवाहों की गवाही से कमजोर पड़ा अभियोजन पक्ष, एक गवाह अदालत में अपने बयान से मुकरा तो दूसरे की गवाही ही नहीं हो सकी; साक्ष्यों के अभाव में सभी आरोपियों को मिला संदेह का लाभ
बिलासपुर(छत्तीसगढ़ उजाला)-बिलासपुर के बहुचर्चित संजू त्रिपाठी हत्याकांड में जिला एवं सत्र न्यायालय ने एक बड़ा फैसला सुनाते हुए मामले के सभी 22 आरोपियों को दोषमुक्त कर दिया है। अदालत ने अभियोजन पक्ष द्वारा प्रस्तुत साक्ष्यों और गवाहों के बयानों का परीक्षण करने के बाद माना कि आरोपियों के खिलाफ हत्या की साजिश और वारदात में उनकी संलिप्तता संदेह से परे साबित नहीं हो सकी। पर्याप्त साक्ष्य नहीं मिलने के कारण अदालत ने सभी आरोपियों को संदेह का लाभ देते हुए बरी कर दिया।
इस मामले में सबसे अहम बात यह रही कि पुलिस ने संजू त्रिपाठी के सगे भाई कपिल त्रिपाठी को भी हत्या की साजिश का मुख्य आरोपी बनाया था। पुलिस की जांच में दोनों भाइयों के बीच संपत्ति विवाद और पुरानी रंजिश को हत्या की वजह बताया गया था। लेकिन लंबी न्यायिक प्रक्रिया के बाद अभियोजन पक्ष अदालत में आरोपों को साबित करने में सफल नहीं हो सका।
14 दिसंबर 2022 को बिलासपुर में उस वक्त सनसनी फैल गई थी, जब कुदुदंड निवासी संजू त्रिपाठी की सकरी बायपास के पास दिनदहाड़े गोली मारकर हत्या कर दी गई थी। घटना के समय संजू अपनी कार में सवार था। इसी दौरान हमलावरों ने उसे निशाना बनाते हुए ताबड़तोड़ गोलियां चलाईं और वारदात को अंजाम देने के बाद मौके से फरार हो गए।
सरेराह हुई इस सनसनीखेज वारदात ने पूरे शहर को झकझोर दिया था। मामले की गंभीरता को देखते हुए पुलिस ने व्यापक जांच शुरू की थी। जांच के दौरान उत्तर प्रदेश के शूटरों सहित स्थानीय लोगों की भूमिका सामने आने का दावा किया गया। पुलिस ने अलग-अलग कड़ियों को जोड़ते हुए हत्या की साजिश का खुलासा करने की बात कही थी।
पुलिस के मुताबिक, संजू त्रिपाठी और उसके भाई कपिल त्रिपाठी के बीच संपत्ति के बंटवारे और वर्चस्व को लेकर लंबे समय से विवाद चल रहा था। इसी विवाद और पुरानी रंजिश को हत्या की साजिश की मुख्य वजह मानते हुए पुलिस ने कपिल त्रिपाठी को मुख्य आरोपी बनाया था।
जांच के दौरान पुलिस ने अन्य आरोपियों की भूमिका भी चिह्नित की और कुल 22 आरोपियों के खिलाफ न्यायालय में चालान पेश किया। पुलिस का दावा था कि हत्या की साजिश सुनियोजित तरीके से रची गई थी और इसमें शूटरों के साथ अन्य लोगों की भी भूमिका थी।
मुकदमे की सुनवाई के दौरान अभियोजन पक्ष को सबसे बड़ा झटका चश्मदीद गवाहों के स्तर पर लगा। पुलिस ने इस हत्याकांड में दो प्रमुख चश्मदीद गवाह बनाए थे, जिनकी गवाही को आरोपियों के खिलाफ महत्वपूर्ण माना जा रहा था।
लेकिन अदालत में सुनवाई के दौरान एक चश्मदीद गवाह अपने पूर्व बयान से मुकर गया, जबकि दूसरे चश्मदीद की गवाही ही दर्ज नहीं हो सकी। ऐसे में अभियोजन पक्ष को प्रत्यक्षदर्शियों से वह समर्थन नहीं मिल पाया, जिसकी अपेक्षा की जा रही थी।
इसके अलावा आरोपियों को हत्या की साजिश और वारदात से सीधे जोड़ने वाले तकनीकी, फॉरेंसिक तथा परिस्थितिजन्य साक्ष्य भी आरोपों को संदेह से परे साबित करने के लिए पर्याप्त नहीं पाए गए। नतीजतन अभियोजन पक्ष की पूरी कहानी अदालत में कानूनी कसौटी पर खरी नहीं उतर सकी।
दोनों पक्षों की दलीलें सुनने और उपलब्ध साक्ष्यों का परीक्षण करने के बाद जिला एवं सत्र न्यायालय ने पाया कि अभियोजन पक्ष आरोपियों के विरुद्ध अपराध प्रमाणित करने में सफल नहीं रहा। इसके बाद अदालत ने सभी 22 आरोपियों को संदेह का लाभ देते हुए दोषमुक्त कर दिया।
बिलासपुर के चर्चित हत्याकांड में आए इस फैसले ने एक बार फिर जांच, चश्मदीद गवाहों की विश्वसनीयता और अभियोजन की साक्ष्य जुटाने की प्रक्रिया को चर्चा के केंद्र में ला दिया है। जिस मामले में पुलिस ने संपत्ति विवाद से लेकर शूटरों तक की भूमिका सामने रखने का दावा किया था, उसी मामले में अदालत में आरोप साबित नहीं हो सके।
संजू त्रिपाठी हत्याकांड का यह फैसला शहर के सबसे चर्चित आपराधिक मामलों में एक अहम न्यायिक घटनाक्रम माना जा रहा है।




