*नेतृत्वविहीन CGPSC: अटकी नियुक्तियां, थमी पदोन्नति और प्रतीक्षा में भविष्य…….*

नेतृत्वविहीन CGPSC: अटकी नियुक्तियां, थमी पदोन्नति और प्रतीक्षा में भविष्य
अध्यक्ष की कुर्सी खाली रहने से 265 पदों की साक्षात्कार प्रक्रिया प्रभावित, सौ से अधिक प्राध्यापकों की पदोन्नति भी अधर में
रायपुर छत्तीसगढ़ उजाला।
छत्तीसगढ़ लोक सेवा आयोग जैसी महत्वपूर्ण संवैधानिक संस्था इन दिनों नेतृत्व के अभाव से जूझ रही है। आयोग के अध्यक्ष की कुर्सी बीते 15 दिनों से खाली है। इसका सीधा असर नई भर्तियों, साक्षात्कार और विभागीय पदोन्नति की प्रक्रियाओं पर दिखाई देने लगा है। राज्य सेवा परीक्षा-2025 के अंतर्गत 265 पदों के लिए प्रस्तावित साक्षात्कार अटक गए हैं, जबकि उच्च शिक्षा विभाग के सौ से अधिक प्राध्यापक पदोन्नति की प्रतीक्षा कर रहे हैं।
पूर्व अध्यक्ष रीता शांडिल्य का कार्यकाल 8 सितंबर को समाप्त हो गया, लेकिन शासन की ओर से अब तक न तो नियमित अध्यक्ष नियुक्त किया गया है और न ही किसी अधिकारी को कार्यकारी जिम्मेदारी सौंपी गई है। प्रदेश के प्रशासनिक ढांचे को योग्य अधिकारी देने वाली संस्था में ऐसी स्थिति शासन की तत्परता और निर्णय क्षमता पर गंभीर सवाल खड़े करती है।
अभ्यर्थियों की मेहनत पर भारी पड़ता इंतजार
राज्य सेवा परीक्षा केवल एक प्रतियोगी परीक्षा नहीं, बल्कि हजारों युवाओं की वर्षों की तपस्या, संघर्ष और सपनों का माध्यम होती है। अभ्यर्थी कठिन परिश्रम के बाद लिखित परीक्षा उत्तीर्ण कर साक्षात्कार तक पहुंचते हैं। ऐसे में प्रशासनिक कारणों से साक्षात्कार स्थगित होना उनके मनोबल को प्रभावित करता है।
नई तारीख घोषित नहीं होने से अभ्यर्थियों में असमंजस बना हुआ है। किसी की आयुसीमा निकट है, किसी ने नौकरी छोड़कर तैयारी की है तो किसी परिवार ने अपने सीमित संसाधनों से बच्चे के सपने को संभाला है। आयोग की एक खाली कुर्सी ने ऐसे अनेक परिवारों की उम्मीदों को प्रतीक्षा की कतार में खड़ा कर दिया है।
मेहनत की राहों पर क्यों इंतजार का पहरा है,हर युवा की आंख में भविष्य का चेहरा है।
कुर्सी भले खाली हो, सपने खाली नहीं होते,वक्त पर फैसले हों तो अरमान घायल नहीं होते।
पदोन्नति की फाइलों पर भी जमी धूल
आयोग में उत्पन्न गतिरोध केवल नई नियुक्तियों तक सीमित नहीं है। उच्च शिक्षा विभाग के सौ से अधिक प्राध्यापकों को प्राचार्य पद पर पदोन्नत करने के लिए विभागीय पदोन्नति समिति की बैठक प्रस्तावित थी। आयोग स्तर की आवश्यक प्रक्रिया पूरी नहीं होने के कारण यह बैठक भी अटक गई है।
इसका प्रभाव कई शासकीय महाविद्यालयों पर पड़ रहा है, जहां प्राचार्य के पद रिक्त हैं। वर्षों तक शिक्षा व्यवस्था को अपनी सेवाएं देने वाले अनेक प्राध्यापक अब सेवानिवृत्ति की दहलीज पर खड़े हैं। उन्हें आशंका है कि निर्णय में देरी के कारण कहीं वे सेवाकाल में मिलने वाली पदोन्नति और उससे जुड़े अधिकारों से वंचित न रह जाएं।
जिन्होंने ज्ञान के दीप जलाए,
वे अपना अधिकार मांग रहे हैं।
वर्षों की सेवा के अंतिम पड़ाव पर,
बस एक निर्णय की राह ताक रहे हैं।
नई भर्तियों पर भी पड़ सकता है असर
अध्यक्ष की नियुक्ति में देरी जारी रही तो प्रस्तावित भर्ती विज्ञापनों और अन्य चयन प्रक्रियाओं पर भी इसका प्रभाव पड़ सकता है। प्रदेश में पहले से बड़ी संख्या में युवा सरकारी नौकरियों की प्रतीक्षा कर रहे हैं। ऐसे समय में आयोग की कार्यप्रणाली धीमी होना बेरोजगार युवाओं के बीच निराशा को और बढ़ा सकता है।
सीजीपीएससी के लगभग 25 वर्षों के इतिहास में संभवतः यह पहला अवसर है, जब नियमित और कार्यकारी—दोनों अध्यक्ष पद एक साथ खाली हैं। यह स्थिति केवल एक प्रशासनिक पद की रिक्तता नहीं, बल्कि उस पूरी व्यवस्था के ठहराव का संकेत है, जिसके साथ प्रदेश के लाखों युवाओं और कर्मचारियों की उम्मीदें जुड़ी हुई हैं।
सरकार शीघ्र करे वैकल्पिक व्यवस्था
शासन को इस गंभीर विषय पर तत्काल निर्णय लेते हुए नियमित अध्यक्ष की नियुक्ति करनी चाहिए। यदि नियुक्ति में समय लग रहा है तो आयोग की गतिविधियां सुचारु रखने के लिए कार्यकारी व्यवस्था की जानी चाहिए। संवैधानिक संस्थाओं की गरिमा केवल उनके अधिकारों से नहीं, बल्कि उनकी निरंतर और निष्पक्ष कार्यप्रणाली से कायम रहती है।




