जनप्रतिनिधि या आवेदक? अधिकारियों के सामने क्यों कमजोर पड़ जाती है जनता की आवाज
बात बेबाक: जनता के वोट से मिली ताकत भूलकर साहबों के सामने ‘जी सर’ करने वाले जनप्रतिनिधियों पर तीखा सवाल
कवर्धा(छत्तीसगढ़ उजाला)-लोकतंत्र में जनता मालिक होती है, जनप्रतिनिधि जनता की आवाज होता है और अधिकारी शासन-प्रशासन की व्यवस्था को संचालित करने वाले सेवक। लेकिन विडंबना देखिए कि कई जगह तस्वीर बिल्कुल उलटी दिखाई देती है। जनता के वोट से जीतकर कुर्सी तक पहुंचने वाले कई जनप्रतिनिधि अधिकारियों के सामने पहुंचते ही इतने संकोची और कमजोर नजर आते हैं, मानो वे जनता के चुने हुए प्रतिनिधि नहीं बल्कि किसी काम के लिए आवेदन लेकर आए हों।
सभी जनप्रतिनिधियों की स्थिति ऐसी नहीं है, लेकिन कमोबेश बड़ी संख्या में नेता, विधायक, सांसद, जिला और जनपद स्तर के प्रतिनिधियों के हालात देखकर सवाल उठता है कि आखिर उन्हें अपनी ताकत का अंदाजा क्यों नहीं है?
अधिकारी कुछ कह दें तो उसे अंतिम सत्य मान लिया जाता है। कार्यकर्ता कुछ भी कहे, जनता कितनी भी शिकायत करे, लेकिन कई जनप्रतिनिधियों की आवाज सरकारी कार्यालय की चौखट तक पहुंचते-पहुंचते धीमी पड़ जाती है।
जनता ने नेता चुना है, ‘आवेदक क्रमांक 420’ नहीं
जनता ने जनप्रतिनिधियों को इसलिए नहीं चुना कि वे हर सरकारी टेबल के सामने खड़े होकर अपनी ही हैसियत का प्रमाणपत्र मांगते रहें।
जनप्रतिनिधि की ताकत किसी अधिकारी की कृपा से नहीं आती। उसकी असली ताकत जनता के वोट से आती है।
अधिकारी शासन की व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं और उनका सम्मान होना चाहिए। लेकिन सम्मान और आत्मसमर्पण में जमीन-आसमान का अंतर है।
अधिकारी से संवाद लोकतंत्र है, समन्वय लोकतंत्र है, लेकिन अधिकारी के सामने अपनी आवाज खो देना लोकतंत्र का “साइलेंट मोड” है।
साहब के कमरे में जाइए, नमस्कार कीजिए, चाय पीजिए और चर्चा कीजिए, लेकिन अपनी आवाज बाहर छोड़कर मत जाइए।
जब बाबू और कर्मचारी भी दिखाने लगें रौब
प्रदेश के कई जिलों में ऐसी स्थिति देखने को मिलती है, जहां कभी-कभी बड़े अधिकारी तो दूर, सरकारी बाबू, सिपाही और छोटे कर्मचारी तक निर्वाचित जनप्रतिनिधियों को वह सम्मान नहीं देते, जिसके वे हकदार हैं।
दृश्य कई बार ऐसा बन जाता है जैसे सामने क्षेत्र का निर्वाचित प्रतिनिधि नहीं, बल्कि अपनी मांग या शिकायत का आवेदन लेकर आया कोई व्यक्ति खड़ा हो।
यह केवल जनप्रतिनिधि का सवाल नहीं है। यह उस जनता के सम्मान का भी सवाल है, जिसने अपने मताधिकार का उपयोग कर उसे चुना है।
कवर्धा में महिला जनप्रतिनिधि के सम्मान पर उठते सवाल
कवर्धा जनपद की अनुसूचित जाति वर्ग की निर्वाचित महिला अध्यक्ष को शासन-प्रशासन के विभिन्न आयोजनों में अपेक्षित स्थान और सम्मान नहीं मिलने को लेकर चर्चाएं होती रही हैं।
आमंत्रण पत्र, फ्लेक्स और बैनरों में निर्वाचित प्रतिनिधियों के नाम और फोटो को लेकर भी सवाल उठते रहे हैं। सत्ता पक्ष से जुड़ी महिला अध्यक्ष को भी अपेक्षित सम्मान नहीं मिल पाने की चर्चा चौक-चौराहों तक पहुंच रही है।
सवाल यह है कि आखिर निर्वाचित पद की गरिमा किससे तय होगी?
कार्यक्रम में मिली कुर्सी से या जनता द्वारा दिए गए अधिकार से?
महिला हो या पुरुष, सत्ता पक्ष का हो या विपक्ष का—हर निर्वाचित जनप्रतिनिधि का सम्मान उसके पद और लोकतांत्रिक अधिकार के अनुरूप होना चाहिए, पसंद और नापसंद के आधार पर नहीं।
कंगना के तेवर से सीख लें जनप्रतिनिधि
भारतीय अभिनेत्री और भाजपा सांसद कंगना रनौत के अधिकारियों के साथ बैठकों में दिखाई देने वाले बेबाक तेवरों की चर्चा अक्सर होती है। सवाल पूछना, जवाब मांगना और जनता से जुड़े मुद्दों पर अधिकारियों को जवाबदेह बनाना—यही तो एक जनप्रतिनिधि की जिम्मेदारी है।
इसका मतलब अधिकारियों से लड़ना या उनका अपमान करना नहीं है।
लेकिन सवाल पूछने का साहस होना चाहिए।
कल्पना कीजिए बैठक का दृश्य—
अधिकारी आराम से फाइल पलट रहे हैं।
अचानक जनता से जुड़े सवालों की बौछार शुरू हो जाए…
काम में देरी का जवाब मांगा जाए…
लापरवाही पर सवाल उठे…
तो शायद अधिकारी ने पहले अपना चश्मा ठीक किया होगा, फिर कुर्सी सीधी की होगी और उसके बाद पानी का गिलास उठाया होगा!
आखिर जब लंबे समय तक केवल “जी सर” की मधुर ध्वनि सुनाई देती रही हो और अचानक कोई जनप्रतिनिधि जनता के सवाल लेकर खड़ा हो जाए, तो एसी के 18 डिग्री तापमान में भी पसीना आना स्वाभाविक है।
गोबरहीन टुरी का संदेश—डरना नहीं, अपनी ताकत पहचानो
हमारे तमाम जनप्रतिनिधियों के लिए गोबरहीन टुरी की तरफ से एक छोटा-सा संदेश—
अधिकारी से डरिए मत, संवाद कीजिए।
बाबू से लड़िए मत, काम करवाइए।
सिपाही से भिड़िए मत, व्यवस्था समझाइए।
लेकिन इतना भी विनम्र मत हो जाइए कि जनता आपको अपना नेता समझे और साहब-बाबू आपको “आवेदक क्रमांक 420”!
जनप्रतिनिधि की कुर्सी सजावट का सामान नहीं है। वह जनता के विश्वास की कुर्सी है।
मूंछ हो या न हो, तेवर हों या न हों—लोकतंत्र में मजबूती से खड़े होने के लिए बस रीढ़ की हड्डी सीधी और गर्दन उठी हुई होनी चाहिए।
और अंत में—
अपनी औकात भूल जाऊं, इतना अमीर नहीं हूं मैं,और कोई मेरी औकात बताए, इतना फकीर नहीं हूं मैं।



