रायपुर मेडिकल कॉलेज में यौन उत्पीड़न मामले ने लिया नया मोड़! गवाही देने वाले छात्र को दबाने की कोशिश के आरोप, परीक्षा से रोकने का आदेश बना बड़ा विवाद—कुलपति ने तत्काल किया निरस्त
पीजी छात्रा से कथित यौन उत्पीड़न मामले में गवाह बताए जा रहे डॉ. इक्षित सिंह पर प्रशासनिक कार्रवाई के आरोपों से गरमाया मामला; आरोपी डॉ. आशीष सिन्हा को बचाने के लिए प्रशासनिक दबाव के इस्तेमाल पर उठे गंभीर सवाल
रायपुर(छत्तीसगढ़ उजाला)-रायपुर मेडिकल कॉलेज में पीजी छात्रा से कथित यौन उत्पीड़न के मामले में अब प्रशासनिक दबाव और गवाह को प्रभावित करने के आरोपों ने नया विवाद खड़ा कर दिया है। मामले में शिकायतकर्ता छात्रा के पक्ष में गवाही देने वाले बताए जा रहे पीजी छात्र डॉ. इक्षित सिंह को परीक्षा से रोकने संबंधी आदेश जारी होने के बाद विश्वविद्यालय प्रशासन की कार्यप्रणाली सवालों के घेरे में आ गई है। सबसे अहम बात यह है कि आयुष विश्वविद्यालय के कुलसचिव डॉ. दिनेश सिन्हा द्वारा जारी इस विवादित आदेश को मामला तूल पकड़ने के बाद कुलपति डॉ. पीके पात्रा ने तत्काल प्रभाव से निरस्त कर दिया है।
इस पूरे घटनाक्रम के बाद कई गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। आखिर यौन उत्पीड़न मामले में गवाह बताए जा रहे छात्र के खिलाफ अचानक प्रशासनिक कार्रवाई क्यों शुरू हुई? मेडिकल कॉलेज के पीजी छात्र को परीक्षा से रोकने का आदेश जारी करने का अधिकार कुलसचिव को किस नियम के तहत मिला? एक छात्र पर कथित नियम उल्लंघन का आरोप होने के बावजूद पूरे कम्युनिटी मेडिसिन विभाग के अन्य पीजी छात्रों की परीक्षा रोकने के निर्देश क्यों दिए गए? और सबसे बड़ा सवाल यह कि आखिर कुलपति को आदेश निरस्त करने की जरूरत क्यों पड़ी?
आरोप लगाए जा रहे हैं कि रायपुर मेडिकल कॉलेज के कम्युनिटी मेडिसिन विभाग में पीजी छात्रा से कथित यौन उत्पीड़न के मामले में आरोपी रहे तत्कालीन एचओडी डॉ. आशीष सिन्हा को बचाने की कोशिश की जा रही है। वहीं, शिकायतकर्ता छात्रा के पक्ष में गवाही देने वाले बताए जा रहे डॉ. इक्षित सिंह के खिलाफ प्रशासनिक कार्रवाई को लेकर यह आरोप भी सामने आ रहा है कि उन पर दबाव बनाने का प्रयास किया जा रहा है। हालांकि इन आरोपों की जांच और आधिकारिक पुष्टि होना बाकी है।
पूरा मामला जुलाई 2025 का बताया जा रहा है। रायपुर मेडिकल कॉलेज के कम्युनिटी मेडिसिन विभाग की एक पीजी छात्रा ने विभाग के तत्कालीन एचओडी डॉ. आशीष सिन्हा पर यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोप लगाए थे। छात्रा ने इस मामले की शिकायत स्वास्थ्य विभाग से की थी। आरोप है कि लंबे समय तक कार्रवाई नहीं होने के बाद छात्रा ने मौदहापारा थाने में शिकायत दर्ज कराई।
मामले की जांच के दौरान छात्रा के सहपाठी डॉ. इक्षित सिंह ने भी कथित तौर पर उसकी शिकायत का समर्थन किया। इसके बाद मामले में एफआईआर दर्ज हुई और आरोपी डॉ. आशीष सिन्हा की गिरफ्तारी की गई। गिरफ्तारी के बाद डॉ. आशीष सिन्हा को जेल जाना पड़ा। बाद में जमानत मिलने के बाद उन्हें मेडिकल एजुकेशन डायरेक्टोरेट में अटैच कर दिया गया।
वहीं, मामले में गवाही और जांच की प्रक्रिया जारी रही। डॉ. इक्षित सिंह का नाम भी इस मामले में गवाह के तौर पर सामने आया। इसी बीच उनके खिलाफ प्रशासनिक कार्रवाई और जांच का आदेश जारी होने के बाद पूरे घटनाक्रम को लेकर सवाल उठने लगे। आरोप लगाया जा रहा है कि यह कार्रवाई गवाह छात्र पर दबाव बनाने और यौन उत्पीड़न मामले में आरोपी को राहत पहुंचाने के उद्देश्य से की गई हो सकती है।
कॉलेज स्तर पर हुई जांच के दौरान डॉ. इक्षित सिंह ने भी कथित तौर पर गंभीर आरोप लगाए थे। उन्होंने कहा था कि डॉ. आशीष सिन्हा उन पर दबाव बनाते थे। शिकायतकर्ता छात्रा से दूर रहने के लिए धमकी दिए जाने के आरोप भी सामने आए थे। ऐसे में अब उसी छात्र के खिलाफ प्रशासनिक कार्रवाई शुरू होने और परीक्षा से रोकने के आदेश के बाद मामला और ज्यादा गंभीर हो गया है।
इस पूरे विवाद में आयुष विश्वविद्यालय के कुलसचिव डॉ. दिनेश सिन्हा की भूमिका पर भी सवाल उठ रहे हैं। कुलसचिव की ओर से जारी आदेश में रायपुर मेडिकल कॉलेज के पीएसएम यानी कम्युनिटी मेडिसिन विभाग के पीजी छात्र डॉ. इक्षित सिंह को केंद्र में रखा गया।
आदेश में डॉ. इक्षित सिंह पर डिस्ट्रिक्ट रेजिडेंट पोस्टिंग के नियमों के उल्लंघन का आरोप लगाया गया। आदेश में कहा गया कि डॉ. इक्षित सिंह को मुख्य परीक्षा में शामिल होने से रोका जाए। लेकिन विवाद केवल यहीं तक सीमित नहीं रहा।
आदेश में मामले की जांच कराने और जांच रिपोर्ट आने तक कम्युनिटी मेडिसिन विभाग के अन्य पीजी छात्रों को भी परीक्षा में शामिल नहीं करने के निर्देश दिए गए। यानी एक छात्र के खिलाफ कथित नियम उल्लंघन के मामले में पूरे विभाग के पीजी छात्रों की परीक्षा पर रोक लगाने की स्थिति पैदा कर दी गई।
यहीं से विश्वविद्यालय प्रशासन के आदेश पर गंभीर सवाल खड़े होने लगे। आखिर एक छात्र के खिलाफ जांच के नाम पर पूरे विभाग के अन्य छात्रों को परीक्षा से क्यों रोका गया? जिन छात्रों का संबंधित कथित नियम उल्लंघन से कोई संबंध नहीं बताया गया, उनकी परीक्षा रोकने का आधार क्या था?
इससे भी बड़ा सवाल यह है कि मेडिकल कॉलेज के पीजी छात्रों की परीक्षा से संबंधित इस तरह का आदेश जारी करने का अधिकार आखिर कुलसचिव के पास किस नियम और प्रावधान के तहत है?
आदेश जारी होने के बाद मामला तेजी से विवादों में आ गया। अधिकार क्षेत्र को लेकर सवाल उठने लगे और प्रशासनिक कार्रवाई के पीछे की मंशा पर भी चर्चा शुरू हो गई। मामला सामने आते ही आयुष विश्वविद्यालय के कुलपति डॉ. पीके पात्रा ने कुलसचिव द्वारा जारी परीक्षा रोकने संबंधी आदेश को तत्काल प्रभाव से निरस्त कर दिया।
कुलपति द्वारा आदेश निरस्त किए जाने के बाद पूरा मामला और भी गंभीर हो गया है। क्योंकि अगर जांच रिपोर्ट आने तक डॉ. इक्षित सिंह और अन्य पीजी छात्रों को परीक्षा से रोकना आवश्यक था, तो फिर कुलपति ने आदेश को तत्काल प्रभाव से समाप्त क्यों कर दिया?
वहीं, अगर आदेश विश्वविद्यालय के नियमों और अधिकार क्षेत्र के अनुरूप नहीं था, तो फिर ऐसा आदेश जारी ही क्यों किया गया?
इन्हीं सवालों के बीच यह आरोप भी तेज हो गया है कि यौन उत्पीड़न मामले और गवाह छात्र के खिलाफ प्रशासनिक कार्रवाई के बीच कोई कथित संबंध हो सकता है। हालांकि विश्वविद्यालय प्रशासन की ओर से इस संबंध में कोई स्पष्ट और विस्तृत जवाब अभी तक सामने नहीं आया है।
मामले को लेकर ‘द सूत्र’ ने आयुष विश्वविद्यालय के कुलसचिव डॉ. दिनेश सिन्हा से बातचीत की। उनसे पूछा गया कि संबंधित आदेश आखिर किस आधार पर जारी किया गया? क्या मेडिकल कॉलेज के पीजी छात्रों को परीक्षा से रोकने का अधिकार कुलसचिव के पास है?
उनसे यह भी पूछा गया कि क्या डॉ. इक्षित सिंह के खिलाफ कार्रवाई का यौन उत्पीड़न मामले में उनकी गवाही से कोई संबंध है? साथ ही यह सवाल भी उठाया गया कि क्या आरोपी डॉ. आशीष सिन्हा को राहत पहुंचाने के लिए पद का दुरुपयोग किया गया?
इन सवालों पर कुलसचिव डॉ. दिनेश सिन्हा ने विस्तृत जवाब देने के बजाय केवल इतना कहा कि मामले की जांच जारी है और जांच रिपोर्ट आने के बाद पूरी जानकारी दी जाएगी।
लेकिन कुलसचिव के इस जवाब के बाद भी विवाद खत्म नहीं हुआ है। उल्टा कुलपति द्वारा परीक्षा रोकने का आदेश निरस्त किए जाने से कई नए सवाल खड़े हो गए हैं।
अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि अगर डॉ. इक्षित सिंह के खिलाफ कथित नियम उल्लंघन की जांच वास्तव में जरूरी थी, तो क्या जांच के नाम पर उन्हें मुख्य परीक्षा से रोकना उचित था? और अगर जांच पूरी होने तक कार्रवाई जरूरी थी, तो कुलपति ने आदेश को तत्काल प्रभाव से निरस्त क्यों किया?
क्या एक छात्र के खिलाफ जांच के बहाने पूरे कम्युनिटी मेडिसिन विभाग के पीजी छात्रों की परीक्षा रोकना न्यायसंगत था?
और सबसे गंभीर सवाल—क्या यौन उत्पीड़न मामले में शिकायतकर्ता छात्रा के पक्ष में गवाही देने वाले बताए जा रहे छात्र पर प्रशासनिक दबाव बनाने की कोशिश की गई?
रायपुर मेडिकल कॉलेज का यह मामला अब केवल यौन उत्पीड़न के आरोपों तक सीमित नहीं रह गया है। अब इस मामले में विश्वविद्यालय प्रशासन की भूमिका, कुलसचिव के अधिकार क्षेत्र, परीक्षा रोकने के आदेश और गवाह छात्र पर कथित प्रशासनिक दबाव जैसे गंभीर मुद्दे सामने आ गए हैं।
कुलपति द्वारा विवादित आदेश को निरस्त किए जाने के बाद यह मामला और ज्यादा सुर्खियों में आ गया है। अब सभी की नजर इस बात पर टिकी है कि जांच में क्या सामने आता है और विश्वविद्यालय प्रशासन इस पूरे मामले में आगे क्या कार्रवाई करता है।
फिलहाल, एक बात साफ है कि यौन उत्पीड़न मामले में गवाही देने वाले बताए जा रहे पीजी छात्र के खिलाफ कार्रवाई और उसके बाद परीक्षा से रोकने का आदेश जारी होना, फिर कुलपति द्वारा उसी आदेश को तत्काल निरस्त कर देना—इस पूरे घटनाक्रम ने रायपुर मेडिकल कॉलेज और आयुष विश्वविद्यालय प्रशासन की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।




