समग्र शिक्षा में बदहाल व्यवस्था फिर हुई उजागर… सप्लाई के खेल में ‘सब हो रहे लाल’! अरबों के फंड और उपकरणों क़े जांच की उठी मांग
652 स्कूलों में शुरू हुई व्यावसायिक शिक्षा योजना अधर में, सैकड़ों स्कूलों को ढाई साल बाद भी नहीं मिले प्रशिक्षक
रायपुर(छत्तीसगढ़ उजाला)-समग्र शिक्षा के तहत केंद्र सरकार से हर वर्ष शिक्षा व्यवस्था को मजबूत करने के लिए बड़ी राशि प्राप्त होती है। लेकिन सवाल यह उठ रहा है कि क्या इस राशि का उपयोग वास्तव में योजनाओं के उद्देश्य के अनुरूप हो रहा है? छत्तीसगढ़ में सरकारी स्कूलों के लिए शुरू की गई व्यावसायिक शिक्षा योजना की मौजूदा स्थिति ने समग्र शिक्षा विभाग की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
प्रदेश के सैकड़ों सरकारी स्कूलों में रोजगारोन्मुखी शिक्षा देने के उद्देश्य से शुरू की गई व्यावसायिक शिक्षा योजना अब अफसरों की उदासीनता, भर्ती विवाद और कथित लेन-देन के आरोपों के बीच उलझी नजर आ रही है। करीब ढाई साल पहले 652 सरकारी स्कूलों में नए व्यावसायिक ट्रेड शुरू किए गए थे, जिनमें प्रत्येक स्कूल में दो-दो व्यावसायिक प्रशिक्षकों की नियुक्ति की जानी थी।
लेकिन योजना शुरू होने के बाद भी बड़ी संख्या में स्कूल प्रशिक्षकों की नियुक्ति का इंतजार कर रहे हैं। पिछले वर्ष भर्ती प्रक्रिया को लेकर भ्रष्टाचार और कथित लेन-देन के गंभीर आरोप सामने आने के बाद प्रक्रिया बीच में ही रोक दी गई थी। इसका सीधा असर विद्यार्थियों की पढ़ाई और करोड़ों रुपये से स्थापित संसाधनों पर पड़ा है।
499 हाई और हायर सेकेंडरी स्कूलों में अब तक नहीं पहुंचे प्रशिक्षक
मौजूदा स्थिति यह है कि प्रदेश के 499 हाई और हायर सेकेंडरी स्कूलों में अब तक व्यावसायिक प्रशिक्षकों की नियुक्ति नहीं हो सकी है। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि जिन स्कूलों में व्यावसायिक पाठ्यक्रम शुरू कर दिए गए, वहां बच्चों को प्रशिक्षण कौन देगा?
स्कूल शिक्षा मंत्री गजेंद्र यादव ने कहा है कि स्कूलों में व्यावसायिक पाठ्यक्रम के लिए प्रशिक्षण उपलब्ध कराने की प्रक्रिया चल रही है और जल्द ही प्रशिक्षकों की नियुक्ति कर दी जाएगी। हालांकि, इतने लंबे समय से लंबित व्यवस्था को लेकर विभाग की कार्यप्रणाली पर सवाल लगातार बने हुए हैं।
सप्लाई के खेल पर गंभीर सवाल, जांच हुई तो खुल सकते हैं बड़े राज
सूत्रों के अनुसार समग्र शिक्षा विभाग में विभिन्न योजनाओं के तहत बड़ी मात्रा में सामग्री और उपकरणों की सप्लाई का काम होता है। आरोप हैं कि कुछ बड़े सप्लायरों और विभागीय अधिकारियों की कथित मिलीभगत से वर्षों से सप्लाई का खेल संचालित किया जा रहा है।
विभाग में होने वाली खरीद, सप्लाई और उपकरणों की गुणवत्ता को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं। जानकारों का कहना है कि यदि समग्र शिक्षा के तहत हुए खर्च, सप्लाई आदेशों और उपकरणों की खरीद की निष्पक्ष एवं व्यापक जांच कराई जाए तो बड़े वित्तीय अनियमितताओं के मामले सामने आ सकते हैं।
हालांकि, इन आरोपों की स्वतंत्र जांच और आधिकारिक पुष्टि होना बाकी है। ऐसे में विभागीय खरीद और सप्लाई व्यवस्था की पारदर्शी जांच की मांग तेज हो रही है।
शिक्षकों पर नौकरी का संकट, दो महीने के वेतन का भी इंतजार
वर्ष 2014-15 से कार्यरत व्यावसायिक प्रशिक्षक भी नई व्यवस्था को लेकर परेशान हैं। नए शैक्षणिक सत्र में शुरू की गई री-टेंडरिंग प्रक्रिया पर प्रशिक्षकों ने गहरा असंतोष जताया है।
प्रशिक्षकों का कहना है कि यदि वोकेशनल ट्रेनिंग पार्टनर (वीटीपी) बदलता है तो वर्षों से अपनी सेवाएं दे रहे प्रशिक्षकों की नौकरी पर संकट खड़ा हो सकता है। लंबे समय से काम कर रहे प्रशिक्षकों के भविष्य को लेकर भी स्पष्ट नीति सामने नहीं आ सकी है।
इसके अलावा कई प्रशिक्षक दो महीने का वेतन नहीं मिलने से आर्थिक परेशानियों का सामना कर रहे हैं। बताया जा रहा है कि प्रशिक्षकों के बिलों का सत्यापन निजी सीए के माध्यम से कराया जा रहा है, जिससे भुगतान प्रक्रिया में देरी की शिकायतें सामने आ रही हैं।
40 करोड़ के उपकरण बन रहे शो-पीस, धूल फांक रही लैब
व्यावसायिक शिक्षा योजना की शुरुआत के दौरान 652 स्कूलों में लैब, लाइब्रेरी और प्रशिक्षण सामग्री उपलब्ध कराने के लिए करीब 40 करोड़ रुपये के उपकरण भेजे गए थे।
लेकिन प्रशिक्षकों की अनुपलब्धता के कारण बड़ी संख्या में ये उपकरण उपयोग में नहीं आ पा रहे हैं। करोड़ों रुपये की लागत से स्थापित संसाधन कई स्कूलों में धूल फांक रहे हैं और शो-पीस बनकर रह गए हैं।
सवाल यह है कि जब बच्चों को प्रशिक्षण देने के लिए प्रशिक्षकों की नियुक्ति सुनिश्चित नहीं थी तो करोड़ों रुपये खर्च कर उपकरणों की सप्लाई किस योजना और व्यवस्था के तहत की गई?
बच्चों ने लिया दाखिला, लेकिन पढ़ाने वाला ही नहीं
व्यावसायिक शिक्षा को लेकर विद्यार्थियों में शुरुआत में उत्साह था। बच्चों ने विभिन्न ट्रेडों में दाखिला लिया, लेकिन कई स्कूलों में मार्गदर्शन देने के लिए प्रशिक्षक ही उपलब्ध नहीं हुए।
इसका असर विद्यार्थियों की पढ़ाई पर पड़ा। रोजगारोन्मुखी शिक्षा देने का उद्देश्य धरातल पर कमजोर पड़ता नजर आया। बताया जाता है कि पिछले वर्ष कई विद्यार्थियों ने बीच सत्र में व्यावसायिक शिक्षा छोड़कर अन्य विषयों, यहां तक कि संस्कृत विषय में प्रवेश लेना बेहतर समझा।
ऐसे में सवाल उठता है कि जिस योजना का उद्देश्य बच्चों को कौशल विकास और रोजगार से जोड़ना था, वह विभागीय अव्यवस्था के कारण आखिर किस दिशा में जा रही है?
राष्ट्रीय शिक्षा नीति के लक्ष्य पर भी संकट
राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 में कक्षा छठवीं से ही व्यावसायिक शिक्षा को शामिल करने का प्रावधान किया गया है। केंद्र सरकार ने वर्ष 2025 तक 50 प्रतिशत स्कूलों में व्यावसायिक पाठ्यक्रम लागू करने का लक्ष्य निर्धारित किया था।
इस दिशा में एनसीईआरटी, एआईसीटीई, यूजीसी और एनसीवीईटी जैसी संस्थाओं को आवश्यक फ्रेमवर्क तैयार करने की जिम्मेदारी दी गई थी। उम्मीद की जा रही थी कि शैक्षणिक सत्र 2024-25 से व्यावसायिक शिक्षा की व्यवस्था व्यापक रूप से धरातल पर दिखाई देगी।
लेकिन छत्तीसगढ़ में भर्ती प्रक्रिया में देरी, विवाद और विभागीय लेटलतीफी के कारण यह महत्वाकांक्षी योजना अधर में लटकी हुई दिखाई दे रही है।
ढाई साल बाद भी सवाल वही—जिम्मेदार कौन?
सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब सैकड़ों स्कूलों में व्यावसायिक पाठ्यक्रम शुरू कर दिया गया था तो प्रशिक्षकों की नियुक्ति समय पर क्यों नहीं की गई?
करोड़ों रुपये के उपकरणों का उपयोग क्यों नहीं हो पा रहा है?
भर्ती प्रक्रिया में कथित अनियमितताओं के आरोपों की स्थिति क्या है?
वर्षों से कार्यरत प्रशिक्षकों के भविष्य की जिम्मेदारी कौन लेगा?
दो महीने से लंबित वेतन का भुगतान कब होगा?
करोड़ों की सप्लाई और खरीद की स्वतंत्र जांच क्यों नहीं कराई जा रही?
आखिर योजना की बदहाल स्थिति के लिए जिम्मेदार अधिकारियों पर जवाबदेही कब तय होगी?
समग्र शिक्षा के तहत केंद्र सरकार से मिलने वाली बड़ी राशि और व्यावसायिक शिक्षा जैसी महत्वपूर्ण योजना के बावजूद जमीनी स्थिति चिंताजनक बनी हुई है। एक ओर बच्चे प्रशिक्षक का इंतजार कर रहे हैं, दूसरी ओर करोड़ों रुपये के उपकरण उपयोग के बिना पड़े हैं और वर्षों से काम कर रहे प्रशिक्षक नौकरी व वेतन की चिंता में हैं।
अब जरूरत है कि सरकार और समग्र शिक्षा विभाग इस पूरी व्यवस्था की गंभीर समीक्षा करे। भर्ती प्रक्रिया को पारदर्शी तरीके से जल्द पूरा किया जाए, लंबित वेतन का भुगतान किया जाए और उपकरणों तथा सप्लाई से जुड़े मामलों की निष्पक्ष जांच कराई जाए।
स्कूल शिक्षा मंत्री गजेंद्र यादव ने कहा—“स्कूलों में व्यावसायिक पाठ्यक्रम के लिए प्रशिक्षण उपलब्ध कराने की प्रक्रिया चल रही है। जल्द ही प्रशिक्षक नियुक्त कर दिए जाएंगे।”
अब देखना यह होगा कि मंत्री के आश्वासन के बाद सैकड़ों स्कूलों को प्रशिक्षक कब मिलते हैं और करोड़ों रुपये की लागत से खरीदे गए उपकरण वास्तव में विद्यार्थियों के काम कब आते हैं।



