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जांच के नाम पर ‘बीमारी’ का कारोबार?छत्तीसगढ़ में पैथोलॉजी लैब की व्यवस्था पर गंभीर सवाल—आखिर जांच करने वालों की योग्यता और रिपोर्ट की विश्वसनीयता कौन परख रहा?

शहर से गांव तक तेजी से खुल रही लैब, गलत रिपोर्ट हुई तो मरीज के जीवन की जिम्मेदारी किसकी?

रायपुर(छत्तीसगढ़ उजाला)-बीमारी की पहचान जिस जांच रिपोर्ट के भरोसे की जाती है, अगर उसी रिपोर्ट की विश्वसनीयता संदेह के घेरे में आ जाए तो मरीज आखिर भरोसा किस पर करे? छत्तीसगढ़ में स्वास्थ्य सुविधाओं के विस्तार के साथ शहरों, कस्बों और गांवों तक पैथोलॉजी लैब एवं डायग्नोस्टिक सेंटरों का जाल तेजी से फैल रहा है। लेकिन इसी के साथ एक बेहद गंभीर सवाल भी खड़ा हो रहा है—क्या इन जांच केंद्रों की निगरानी उतनी ही गंभीरता से हो रही है, जितनी गंभीरता से मरीजों की बीमारियों की जांच की जाती है?

प्रदेश के अलग-अलग हिस्सों से समय-समय पर ऐसी शिकायतें सामने आती रही हैं कि कुछ स्थानों पर पर्याप्त योग्यता, आवश्यक अनुमति अथवा निर्धारित मानकों को लेकर सवालों के बीच पैथोलॉजी एवं जांच केंद्र संचालित हो रहे हैं। ऐसे में स्वास्थ्य विभाग के सामने चुनौती केवल यह गिनने की नहीं है कि प्रदेश में कितनी लैब चल रही हैं, बल्कि असली सवाल यह है कि—

इन लैब में जांच कौन कर रहा है? उसकी शैक्षणिक और तकनीकी योग्यता क्या है? और जिस जांच की रिपोर्ट तैयार की जा रही है, क्या संबंधित व्यक्ति को वैधानिक रूप से वह कार्य करने का अधिकार है?

कागज पर छपे आंकड़े नहीं, रिपोर्ट पर टिका होता है किसी का जीवन

खून की जांच हो, शुगर की जांच, थायरॉइड, किडनी और लिवर से संबंधित परीक्षण हों या किसी गंभीर बीमारी की प्रारंभिक पहचान—चिकित्सक के उपचार की दिशा तय करने में जांच रिपोर्ट की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण होती है।

डॉक्टर मरीज की स्थिति के साथ-साथ जांच रिपोर्ट के आधार पर दवाइयां, उपचार और आगे की चिकित्सा प्रक्रिया तय करता है। ऐसे में यदि रिपोर्ट गलत हो, तो इलाज की दिशा भी गलत हो सकती है।

यही कारण है कि पैथोलॉजी रिपोर्ट महज कंप्यूटर से निकला एक कागज नहीं है। उसके हर आंकड़े के पीछे एक मरीज की चिंता, एक परिवार की उम्मीद और चिकित्सक का अगला निर्णय जुड़ा होता है।

कल्पना कीजिए, यदि किसी स्वस्थ व्यक्ति की रिपोर्ट उसे गंभीर बीमारी की आशंका में डाल दे, या वास्तव में बीमार मरीज को रिपोर्ट सामान्य बता दिया जाए, तो उसके परिणाम कितने गंभीर हो सकते हैं।

गलत रिपोर्ट केवल गलत आंकड़ा नहीं हो सकती—वह गलत इलाज, अनावश्यक दवाइयों, आर्थिक नुकसान और गंभीर परिस्थितियों में मरीज के जीवन तक को प्रभावित कर सकती है।

सवाल सिर्फ लैब का नहीं, उस नाम का भी है जिसके हस्ताक्षर से रिपोर्ट निकलती है

स्वास्थ्य विभाग को केवल लैब के बोर्ड और पंजीयन तक सीमित रहने के बजाय यह भी सुनिश्चित करना होगा कि प्रत्येक जांच केंद्र में—

नमूना कौन ले रहा है?

तकनीकी जांच कौन कर रहा है?

संबंधित व्यक्ति की शैक्षणिक योग्यता क्या है?

मशीनों का रखरखाव किस स्तर का है?

गुणवत्ता नियंत्रण की व्यवस्था है या नहीं?

रिपोर्ट तैयार करने और सत्यापित करने की जिम्मेदारी किसकी है?

अंतिम रिपोर्ट किस योग्य व्यक्ति के नाम और हस्ताक्षर से जारी की जा रही है?

सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह भी है कि रिपोर्ट पर जिस विशेषज्ञ का नाम दर्ज है, क्या वह वास्तव में उस लैब या संस्थान से जुड़ा हुआ है?

या फिर कहीं ऐसा तो नहीं कि विशेषज्ञ के नाम और योग्यता का इस्तेमाल केवल रिपोर्ट को विश्वसनीय दिखाने के लिए किया जा रहा हो?

यदि किसी जांच केंद्र में ऐसी स्थिति पाई जाती है तो इसे केवल कागजी अनियमितता मानकर छोड़ देना मरीजों के हितों के साथ गंभीर समझौता हो सकता है।

शहरों में विकल्प, गांवों में एक रिपोर्ट ही बन जाती है ‘सच’

बड़े शहरों में मरीज के पास अपेक्षाकृत अधिक विकल्प होते हैं। किसी रिपोर्ट पर संदेह होने पर वह दूसरी लैब या अस्पताल में जांच करा सकता है।

लेकिन असली चिंता छोटे कस्बों और ग्रामीण क्षेत्रों की है।

ग्रामीण इलाकों में स्वास्थ्य सुविधाएं सीमित होती हैं और कई बार स्थानीय जांच केंद्र की रिपोर्ट ही मरीज और चिकित्सक के लिए उपचार का प्रमुख आधार बन जाती है। मरीज के पास न तो बार-बार जांच कराने की आर्थिक क्षमता होती है और न ही दूर-दराज के बड़े शहरों तक पहुंचने की सुविधा।

ऐसे में सवाल और गंभीर हो जाता है—

क्या गांव और कस्बों में संचालित हर जांच केंद्र निर्धारित मानकों का पालन कर रहा है?

स्वास्थ्य विभाग के सामने ये ‘यक्ष प्रश्न’

प्रदेश में पैथोलॉजी एवं डायग्नोस्टिक सेंटरों की व्यवस्था को लेकर कई सवालों के जवाब सार्वजनिक रूप से सामने आने चाहिए—

● प्रदेश में वर्तमान में कितनी पैथोलॉजी लैब और डायग्नोस्टिक सेंटर संचालित हैं?

● क्या इन सभी केंद्रों का अद्यतन रिकॉर्ड स्वास्थ्य विभाग के पास उपलब्ध है?

● पिछले एक वर्ष में कितनी लैब का निरीक्षण किया गया?

● कितने कर्मचारियों और तकनीकी स्टाफ की योग्यता का सत्यापन हुआ?

● कितने केंद्रों में निर्धारित मानकों से संबंधित अनियमितताएं मिलीं?

● कितनी लैब को नोटिस जारी किया गया?

● कितने मामलों में कार्रवाई हुई?

● क्या रिपोर्ट जारी करने वाले विशेषज्ञों की वास्तविक संबद्धता की भी जांच की जाती है?

ये सवाल केवल प्रशासनिक आंकड़ों के लिए नहीं हैं। इनके जवाब सीधे-सीधे लाखों मरीजों की सुरक्षा और स्वास्थ्य व्यवस्था की विश्वसनीयता से जुड़े हैं।

बोर्ड लगाना आसान, भरोसा कमाना कठिन

आज किसी भी शहर, कस्बे या मुख्य सड़क पर ‘पैथोलॉजी लैब’ और ‘डायग्नोस्टिक सेंटर’ के चमकदार बोर्ड आसानी से दिखाई दे जाते हैं।

लेकिन चिकित्सा जांच कोई सामान्य व्यवसाय नहीं है।

यहां एक छोटी-सी तकनीकी गलती किसी व्यक्ति के पूरे उपचार को प्रभावित कर सकती है। गलत रिपोर्ट के कारण मरीज अनावश्यक दवाइयां ले सकता है, मानसिक तनाव झेल सकता है और आर्थिक नुकसान उठा सकता है।

गंभीर बीमारी के मामले में एक गलत रिपोर्ट का असर कहीं अधिक खतरनाक हो सकता है।

इसलिए केवल बोर्ड, मशीन और कंप्यूटर होने से किसी जांच केंद्र की विश्वसनीयता तय नहीं हो जाती।

विश्वास के लिए योग्यता चाहिए, मानक चाहिए, गुणवत्ता नियंत्रण चाहिए और सबसे जरूरी—जवाबदेही चाहिए।

सिर्फ कागजी जांच नहीं, जमीन पर होना चाहिए भौतिक सत्यापन

सरकार और स्वास्थ्य विभाग को इस पूरे क्षेत्र में व्यापक और विशेष अभियान चलाने की आवश्यकता है।

इस अभियान के दौरान केवल दस्तावेज देखने की औपचारिकता नहीं, बल्कि मौके पर जाकर भौतिक सत्यापन किया जाना चाहिए।

जांच के दायरे में शामिल होना चाहिए—

लैब का पंजीयन और आवश्यक अनुमतियां

जांच करने वाले कर्मचारियों की योग्यता

तकनीकी स्टाफ की उपलब्धता

रिपोर्ट जारी करने वाले विशेषज्ञ की पात्रता

विशेषज्ञ की वास्तविक संबद्धता

मशीनों की गुणवत्ता और रखरखाव

गुणवत्ता नियंत्रण की प्रक्रिया

नमूनों के संग्रह और सुरक्षित रखरखाव की व्यवस्था

निर्धारित चिकित्सा एवं तकनीकी मानकों का पालन

नियमों के विरुद्ध संचालित केंद्रों के मामले में केवल नोटिस देकर फाइल बंद कर देना पर्याप्त नहीं होना चाहिए। जहां गंभीर अनियमितताएं मिलें, वहां नियमानुसार प्रभावी कार्रवाई भी सुनिश्चित की जानी चाहिए।

स्वास्थ्य विभाग को अब प्रयोगशालाओं की भी ‘जांच’ करनी होगी

विडंबना यह है कि जिन प्रयोगशालाओं का काम लोगों की बीमारियों की जांच करना है, आज उनकी व्यवस्था और विश्वसनीयता की जांच की मांग उठ रही है।

सरकारी व्यवस्था की असली परीक्षा बड़ी घोषणाओं और योजनाओं से नहीं होती।

उसकी असली परीक्षा उस अंतिम मरीज के विश्वास से होती है, जो अपनी मेहनत की कमाई खर्च कर जांच करवाता है और रिपोर्ट हाथ में लेकर यह मानता है कि—

“इस कागज पर लिखे आंकड़े सही हैं और इसी के आधार पर मेरा इलाज होगा।”

यदि उसी रिपोर्ट की विश्वसनीयता पर सवाल उठने लगें तो नुकसान केवल एक मरीज का नहीं होता।

धीरे-धीरे पूरी स्वास्थ्य व्यवस्था पर समाज का भरोसा कमजोर होने लगता है।

अब जवाबदेही तय करने का समय

छत्तीसगढ़ में तेजी से बढ़ते पैथोलॉजी और डायग्नोस्टिक सेंटरों के बीच सरकार और स्वास्थ्य विभाग को यह सुनिश्चित करना होगा कि चिकित्सा जांच केवल एक कारोबार बनकर न रह जाए।

हर जांच केंद्र में निर्धारित मानकों का पालन हो।

हर तकनीकी कर्मचारी योग्य हो।

हर रिपोर्ट सक्षम और अधिकृत व्यक्ति की निगरानी में तैयार हो।

हर मशीन की गुणवत्ता और रखरखाव सुनिश्चित हो।

और सबसे महत्वपूर्ण—गलत रिपोर्ट या गंभीर लापरवाही की स्थिति में जवाबदेही तय हो।

क्योंकि बीमारी की पहचान करने वाली रिपोर्ट यदि खुद संदेह के घेरे में आ जाए तो केवल मरीज का इलाज नहीं भटकता, बल्कि स्वास्थ्य व्यवस्था पर समाज का भरोसा भी बीमार पड़ने लगता है।

इसलिए अब समय आ गया है कि स्वास्थ्य विभाग केवल मरीजों की जांच की व्यवस्था न देखे, बल्कि जांच करने वाली प्रयोगशालाओं की भी गंभीरता से ‘जांच’ करे।

ताकि छत्तीसगढ़ में जांच के नाम पर कारोबार नहीं, बल्कि मानकों के अनुरूप चिकित्सा सेवा चले—जहां हर रिपोर्ट के पीछे योग्यता हो, जवाबदेही हो और सबसे ऊपर मरीज के जीवन की कीमत समझने वाली संवेदनशीलता हो।

प्रशांत गौतम

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