ब्रेकिंग न्यूज

विद्याचरण शुक्ल: छत्तीसगढ़ से दिल्ली की सत्ता तक दबदबा, नौ बार लोकसभा पहुंचे और कई प्रधानमंत्रियों के साथ लिखी राष्ट्रीय राजनीति की लंबी पारी

छत्तीसगढ़ की मिट्टी से निकला बड़ा राजनीतिक नाम; सत्ता, संघर्ष और विवादों के बीच अंतिम सांस तक प्रदेश की राजनीति में रहे सक्रिय

रायपुर(छत्तीसगढ़ उजाला)-छत्तीसगढ़ की राजनीति का इतिहास जब भी लिखा जाएगा, उसमें विद्याचरण शुक्ल का नाम एक ऐसे कद्दावर नेता के रूप में दर्ज होगा, जिन्होंने अविभाजित मध्यप्रदेश की राजनीति से निकलकर दिल्ली की सत्ता के गलियारों में अपनी अलग और प्रभावशाली पहचान बनाई। समर्थकों के बीच प्यार से ‘विद्या भैया’ कहे जाने वाले विद्याचरण शुक्ल केवल छत्तीसगढ़ के नेता नहीं थे, बल्कि एक दौर में राष्ट्रीय राजनीति के उन प्रभावशाली चेहरों में शामिल थे, जिनकी बात दिल्ली की सत्ता में गंभीरता से सुनी जाती थी।

करीब पांच दशकों से अधिक लंबे राजनीतिक जीवन में उन्होंने सत्ता, संघर्ष, विवाद, चुनावी जीत-हार और दलगत बदलाव—सभी दौर देखे। वे नौ बार लोकसभा के लिए निर्वाचित हुए, कई प्रधानमंत्रियों के साथ काम किया और केंद्र सरकार में महत्वपूर्ण मंत्रालयों की जिम्मेदारी संभाली। हालांकि उनका राजनीतिक जीवन जितना ऊंचाइयों से भरा रहा, उतना ही विवादों से भी जुड़ा रहा। विशेष रूप से आपातकाल के दौरान उनकी भूमिका आज भी भारतीय राजनीति के इतिहास में चर्चा का विषय है।

लेकिन इन सबके बीच एक बात निर्विवाद रही कि विद्याचरण शुक्ल छत्तीसगढ़ से निकलकर राष्ट्रीय राजनीति में असाधारण पहचान बनाने वाले नेताओं में शामिल थे।

राजनीति विरासत में मिली, लेकिन राष्ट्रीय पहचान खुद बनाई

विद्याचरण शुक्ल का जन्म 2 अगस्त 1929 को रायपुर में हुआ था। उनका परिवार पहले से ही राजनीति के केंद्र में था। उनके पिता पंडित रविशंकर शुक्ल अविभाजित मध्यप्रदेश के प्रथम मुख्यमंत्री रहे, जबकि उनके बड़े भाई श्यामाचरण शुक्ल भी मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री बने।

राजनीति उनके परिवार की विरासत जरूर थी, लेकिन विद्याचरण शुक्ल ने अपनी पहचान केवल पारिवारिक पृष्ठभूमि के आधार पर नहीं बनाई। उन्होंने अपने राजनीतिक कौशल, जनसंपर्क और राष्ट्रीय स्तर पर सक्रिय भूमिका के जरिए अलग स्थान हासिल किया।

नागपुर के मॉरिस कॉलेज से शिक्षा प्राप्त करने के बाद उन्होंने व्यवसाय के क्षेत्र में भी हाथ आजमाया। इसके बाद उनका रुझान सक्रिय राजनीति की ओर बढ़ा और वर्ष 1957 में महासमुंद संसदीय क्षेत्र से लोकसभा चुनाव जीतकर वे पहली बार संसद पहुंचे।

यहीं से शुरू हुआ उनका वह लंबा राजनीतिक सफर, जिसने आने वाले दशकों में उन्हें देश की राजनीति का बड़ा नाम बना दिया।

नौ बार लोकसभा पहुंचे, संसद में बनाई अलग पहचान

विद्याचरण शुक्ल का संसदीय सफर भारतीय राजनीति में उनकी मजबूत पकड़ को दर्शाता है। वे कुल नौ बार लोकसभा के सदस्य निर्वाचित हुए। यह उपलब्धि अपने आप में उनके जनाधार और राजनीतिक प्रभाव को बताती है।

रायपुर और महासमुंद सहित छत्तीसगढ़ क्षेत्र की राजनीति से उनका गहरा संबंध रहा। संसद में उनकी मौजूदगी केवल एक सांसद तक सीमित नहीं थी, बल्कि वे लंबे समय तक केंद्र की सत्ता और कांग्रेस संगठन की राजनीति में प्रभावशाली भूमिका निभाते रहे।

उनका व्यक्तित्व ऐसा था कि वे प्रदेश की राजनीति और राष्ट्रीय राजनीति—दोनों स्तरों पर सक्रिय रहते थे। दिल्ली में सत्ता के समीकरणों को समझने के साथ-साथ वे अपने क्षेत्र और समर्थकों के बीच भी मजबूत पकड़ बनाए रखते थे।

इंदिरा गांधी के दौर में बढ़ा राजनीतिक कद

विद्याचरण शुक्ल के राजनीतिक जीवन में बड़ा मोड़ उस समय आया, जब उन्हें 1966 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की सरकार में मंत्री बनने का अवसर मिला।

इसके बाद राष्ट्रीय राजनीति में उनका कद लगातार बढ़ता गया। केंद्र सरकार में रहते हुए उन्होंने विभिन्न महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां संभालीं। अपने लंबे राजनीतिक जीवन में वे संचार, गृह, रक्षा, वित्त, योजना तथा सूचना एवं प्रसारण जैसे महत्वपूर्ण विभागों से जुड़ी जिम्मेदारियों में रहे।

दिल्ली के राजनीतिक गलियारों में उनकी पहचान ऐसे नेता के रूप में थी, जो सत्ता की जटिल राजनीति को समझते थे और बदलते राजनीतिक हालात में अपनी भूमिका बनाए रखने की क्षमता रखते थे।

उनका प्रभाव केवल मध्यप्रदेश तक सीमित नहीं रहा। वे राष्ट्रीय राजनीति के उस दौर के सक्रिय नेताओं में शामिल रहे, जब प्रधानमंत्री कार्यालय, कांग्रेस संगठन और केंद्र सरकार की राजनीति में बड़े नेताओं की भूमिका व्यापक होती थी।

आपातकाल और सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय: राजनीतिक जीवन का सबसे विवादित अध्याय

विद्याचरण शुक्ल के लंबे राजनीतिक जीवन का सबसे चर्चित और विवादास्पद दौर 1975 से 1977 का आपातकाल रहा।

उस समय वे केंद्रीय सूचना एवं प्रसारण मंत्री थे। आपातकाल के दौरान प्रेस पर सेंसरशिप, समाचार पत्रों पर नियंत्रण और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को लेकर देशभर में तीखी बहस हुई। उस दौर में सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय की भूमिका के कारण विद्याचरण शुक्ल भी आलोचनाओं के केंद्र में रहे।

उनकी भूमिका को लेकर विपक्ष और मीडिया के एक बड़े वर्ग ने सवाल उठाए। आपातकाल भारतीय लोकतंत्र के इतिहास का एक अत्यंत विवादित दौर रहा और विद्याचरण शुक्ल का नाम भी उस इतिहास के प्रमुख राजनीतिक पात्रों में शामिल रहा।

हालांकि, आपातकाल समाप्त होने के बाद भी उनका राजनीतिक सफर नहीं रुका। बदलते राजनीतिक हालात और सत्ता परिवर्तन के बावजूद वे लंबे समय तक राष्ट्रीय राजनीति में सक्रिय और प्रभावशाली बने रहे।

यही उनकी राजनीतिक क्षमता का एक बड़ा पहलू भी था कि कठिन और विवादित दौर के बाद भी वे राजनीति के केंद्र से पूरी तरह बाहर नहीं हुए।

कई प्रधानमंत्रियों के साथ किया काम

विद्याचरण शुक्ल का राजनीतिक जीवन कई दशकों और कई प्रधानमंत्रियों के दौर से होकर गुजरा। उन्होंने केवल एक राजनीतिक युग नहीं देखा, बल्कि भारतीय राजनीति के कई बड़े बदलावों के साक्षी रहे।

इंदिरा गांधी के दौर से लेकर बाद की राष्ट्रीय राजनीति तक उनकी सक्रियता बनी रही। वी.पी. सिंह और चंद्रशेखर के दौर की राजनीति में भी उन्होंने केंद्र में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

यह उनकी राजनीतिक यात्रा की विशेषता थी कि वे भारतीय राजनीति के बदलते दौरों के साथ लगातार जुड़े रहे। कांग्रेस के भीतर सत्ता संघर्ष हो, केंद्र में सरकारों का परिवर्तन हो या क्षेत्रीय राजनीति का उभार—विद्याचरण शुक्ल ने हर दौर में अपनी राजनीतिक मौजूदगी बनाए रखी।

कांग्रेस से अलग हुए, फिर लौटे भी

विद्याचरण शुक्ल का राजनीतिक जीवन केवल कांग्रेस पार्टी तक सीमित नहीं रहा। बदलते राजनीतिक समीकरणों के बीच उन्होंने अलग-अलग दौर में अन्य राजनीतिक दलों का भी रुख किया।

छत्तीसगढ़ राज्य के गठन के बाद प्रदेश की राजनीति में भी उनका प्रभाव बना रहा। नए राज्य के गठन के साथ सत्ता और नेतृत्व को लेकर जब राजनीतिक चर्चाएं तेज हुईं, तब मुख्यमंत्री पद के संभावित दावेदारों में भी उनका नाम प्रमुखता से लिया जाता था।

वर्ष 2003 में उन्होंने कांग्रेस छोड़कर राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी का दामन थाम लिया। इसके बाद वर्ष 2004 के लोकसभा चुनाव से पहले वे भारतीय जनता पार्टी में शामिल हुए और महासमुंद लोकसभा सीट से चुनावी मैदान में उतरे।

उस चुनाव में उनका मुकाबला तत्कालीन छत्तीसगढ़ के प्रमुख राजनीतिक चेहरे अजीत जोगी से हुआ। यह मुकाबला छत्तीसगढ़ की राजनीति में काफी चर्चित रहा।

राजनीतिक परिस्थितियां फिर बदलीं और बाद के वर्षों में विद्याचरण शुक्ल की कांग्रेस में वापसी हुई।

उनके राजनीतिक जीवन में दल परिवर्तन जरूर हुए, लेकिन उनका व्यक्तिगत राजनीतिक प्रभाव लंबे समय तक कायम रहा। समर्थकों का एक बड़ा वर्ग उन्हें पार्टी से अधिक उनके व्यक्तिगत राजनीतिक कद और ‘विद्या भैया’ की पहचान से जोड़कर देखता था।

छत्तीसगढ़ की राजनीति में ‘विद्या भैया’ का प्रभाव

विद्याचरण शुक्ल का जनसंपर्क उनकी राजनीति की सबसे बड़ी ताकतों में से एक था। छत्तीसगढ़ में उन्हें बड़े नेता के साथ-साथ एक ऐसे राजनीतिक व्यक्तित्व के रूप में देखा जाता था, जिनका आम लोगों और कार्यकर्ताओं से सीधा जुड़ाव था।

समर्थकों के बीच उनका नाम ‘विद्या भैया’ के रूप में लोकप्रिय था। यह संबोधन केवल राजनीतिक नहीं था, बल्कि उनके और उनके समर्थकों के बीच बने आत्मीय संबंध का प्रतीक भी था।

राष्ट्रीय राजनीति में लंबे समय तक सक्रिय रहने के बावजूद छत्तीसगढ़ की राजनीति से उनका जुड़ाव कभी पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ। दिल्ली की राजनीति में प्रभाव रखने के साथ-साथ वे प्रदेश के राजनीतिक घटनाक्रम पर लगातार नजर रखते थे।

छत्तीसगढ़ राज्य बनने के बाद भी वे प्रदेश की राजनीति के प्रमुख चेहरों में शामिल रहे।

दरभा घाटी हमला: छत्तीसगढ़ की राजनीति का काला दिन

25 मई 2013 का दिन छत्तीसगढ़ के राजनीतिक इतिहास में एक काले अध्याय के रूप में दर्ज है।

बस्तर के दरभा घाटी क्षेत्र में कांग्रेस नेताओं के काफिले पर माओवादियों ने भीषण हमला किया। इस हमले ने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया।

हमले में कांग्रेस के कई वरिष्ठ नेता और कार्यकर्ता मारे गए। विद्याचरण शुक्ल भी इस हमले में गंभीर रूप से घायल हो गए। उनके शरीर में गोलियां लगीं और उनकी हालत अत्यंत गंभीर हो गई।

हमले के बाद उन्हें उपचार के लिए पहले रायपुर ले जाया गया। बाद में बेहतर चिकित्सा सुविधा के लिए उन्हें गुरुग्राम के मेदांता अस्पताल पहुंचाया गया।

वहां उन्होंने कई दिनों तक जिंदगी और मौत के बीच संघर्ष किया।

लेकिन अंततः 11 जून 2013 को विद्याचरण शुक्ल ने अंतिम सांस ली।

उनके निधन के साथ छत्तीसगढ़ की राजनीति के एक बड़े युग का अंत हो गया।

राजकीय सम्मान के साथ अंतिम विदाई

विद्याचरण शुक्ल के निधन की खबर से पूरे छत्तीसगढ़ में शोक की लहर फैल गई। राजनीतिक दलों से ऊपर उठकर विभिन्न क्षेत्रों के लोगों ने उन्हें श्रद्धांजलि दी।

रायपुर में पूरे राजकीय सम्मान के साथ उनका अंतिम संस्कार किया गया। उनकी अंतिम यात्रा में बड़ी संख्या में समर्थक, राजनीतिक नेता और आम नागरिक शामिल हुए।

हजारों लोगों ने नम आंखों से अपने प्रिय नेता को अंतिम विदाई दी। उस समय समर्थकों के बीच ‘विद्या भैया अमर रहें’ के नारे गूंजते रहे।

उनकी अंतिम यात्रा केवल एक नेता की विदाई नहीं थी, बल्कि छत्तीसगढ़ की राजनीति के एक ऐसे दौर की विदाई थी, जिसने कई दशकों तक प्रदेश और राष्ट्रीय राजनीति को प्रभावित किया।

सत्ता, संघर्ष, विवाद और लंबी राजनीतिक पारी

विद्याचरण शुक्ल का राजनीतिक जीवन किसी सीधी और सरल रेखा जैसा नहीं था।

उसमें सत्ता की ऊंचाइयां थीं, राजनीतिक संघर्ष था, विवाद थे, दल परिवर्तन थे और चुनावी जीत-हार भी थी। उन्होंने राष्ट्रीय राजनीति में बड़े पद संभाले, सत्ता के शीर्ष नेताओं के साथ काम किया और कई राजनीतिक उतार-चढ़ाव देखे।

उनकी राजनीति पर सहमति और असहमति दोनों हो सकती हैं।

आपातकाल के दौरान उनकी भूमिका को लेकर आलोचना भारतीय राजनीतिक इतिहास का हिस्सा है। दूसरी ओर, यह भी एक ऐतिहासिक तथ्य है कि छत्तीसगढ़ क्षेत्र से निकलकर उन्होंने राष्ट्रीय राजनीति में जो स्थान बनाया, वह असाधारण था।

नौ बार लोकसभा पहुंचना और केंद्र सरकार में महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां संभालना उनके लंबे राजनीतिक कद की स्पष्ट तस्वीर पेश करता है।

छत्तीसगढ़ से दिल्ली तक मजबूत मौजूदगी

विद्याचरण शुक्ल की सबसे बड़ी राजनीतिक उपलब्धि यह थी कि उन्होंने क्षेत्रीय राजनीति तक खुद को सीमित नहीं रखा।

रायपुर और महासमुंद की धरती से निकलकर वे दिल्ली की सत्ता तक पहुंचे और वहां दशकों तक अपनी मजबूत उपस्थिति दर्ज कराई।

वे उस पीढ़ी के नेताओं में शामिल थे, जिनकी आवाज राष्ट्रीय राजनीति में सुनी जाती थी और जिनके राजनीतिक फैसलों का असर मध्यप्रदेश तथा बाद में छत्तीसगढ़ की राजनीति पर दिखाई देता था।

आज के दौर में जब राजनीति तेजी से बदल रही है और राष्ट्रीय स्तर पर प्रभाव रखने वाले क्षेत्रीय नेताओं की भूमिका भी नए रूप में सामने आ रही है, तब विद्याचरण शुक्ल का राजनीतिक जीवन एक अलग उदाहरण प्रस्तुत करता है।

छत्तीसगढ़ की राजनीति का एक पूरा युग

विद्याचरण शुक्ल अब इस दुनिया में नहीं हैं, लेकिन उनका राजनीतिक सफर आज भी छत्तीसगढ़ और देश की राजनीति के इतिहास का महत्वपूर्ण हिस्सा है।

वे केवल एक सांसद या केंद्रीय मंत्री नहीं थे। वे उस राजनीतिक पीढ़ी के प्रतिनिधि थे, जिसने प्रदेश की सीमाओं से निकलकर राष्ट्रीय राजनीति में अपनी मजबूत पहचान बनाई।

उनके जीवन में उपलब्धियां थीं, विवाद थे और संघर्ष भी थे। लेकिन एक बात निर्विवाद है कि छत्तीसगढ़ से निकलकर राष्ट्रीय राजनीति में जिस ऊंचाई तक विद्याचरण शुक्ल पहुंचे, वहां तक पहुंचने वाले नेताओं की संख्या बहुत कम रही है।

करीब पांच दशकों से अधिक समय तक सक्रिय राजनीति में रहने वाले विद्याचरण शुक्ल ने रायपुर से लेकर महासमुंद और दिल्ली तक अपनी अलग राजनीतिक पहचान बनाई।

उनकी राजनीति से सहमति हो या असहमति, उनके फैसलों की आलोचना हो या प्रशंसा—लेकिन छत्तीसगढ़ की राजनीति के इतिहास से ‘विद्या भैया’ का नाम अलग नहीं किया जा सकता।

विद्याचरण शुक्ल का जीवन दरअसल छत्तीसगढ़ की उस राजनीतिक पीढ़ी की कहानी है, जिसने अपने क्षेत्र की सीमाओं को पार कर देश की राजनीति में प्रभावशाली स्थान बनाया।

आज ‘विद्या भैया’ हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन छत्तीसगढ़ की राजनीति में उनका नाम, उनका राजनीतिक कद और उनका पूरा दौर लंबे समय तक याद किया जाता रहेगा।

प्रशांत गौतम

Related Articles

Back to top button