
सियासत……
तबादलों की सूची में सबका नंबर, पर ‘साहब’ का नंबर कब आएगा?
लंबे समय से एक ही जिले में जमे कलेक्टर को लेकर प्रशासनिक गलियारों में चर्चा—साय सरकार भूली या ऊपर से है कोई ‘कृपा’?
रायपुर छत्तीसगढ़ उजाला। छत्तीसगढ़ की प्रशासनिक व्यवस्था में समय-समय पर अधिकारियों के तबादले होते रहते हैं। कोई अधिकारी नई जिम्मेदारी संभालता है तो किसी को मंत्रालय बुला लिया जाता है। लेकिन इन तबादलों के बीच कुछ कुर्सियां ऐसी भी नजर आती हैं, जिन पर शायद तबादले के आदेश का असर ही नहीं पड़ता।प्रदेश के एक जिले में लंबे समय से पदस्थ कलेक्टर को लेकर इन दिनों प्रशासनिक और राजनीतिक गलियारों में कुछ ऐसी ही चर्चाएं सुनाई दे रही हैं। सवाल उठ रहा है कि आखिर सरकार की नजर इस जिले तक क्यों नहीं पहुंच रही? वो भी बड़े शहर में सरकार का ध्यान क्यों नहीं जा रहा है।क्या सरकार इन साहब का तबादला करना भूल गई है या फिर सत्ता के किसी प्रभावशाली चेहरे का ऐसा आशीर्वाद प्राप्त है कि तबादले की फाइल इनके नाम पर आते ही आगे बढ़ना भूल जाती है?व्यंग्य में कहें तो सरकारी कुर्सी भी कभी-कभी इतनी आरामदायक हो जाती है कि अधिकारी और जिला एक-दूसरे के पर्याय से लगने लगते हैं। दूसरे अधिकारियों के लिए स्थानांतरण प्रशासनिक प्रक्रिया है, लेकिन कुछ चुनिंदा लोगों के मामले में शायद कैलेंडर के पन्ने बदलते हैं, आदेश नहीं।

मुख्यमंत्री विष्णु देव साय की सरकार प्रशासनिक कसावट और सुशासन की बात करती रही है।एक दिन पूर्व ही बड़ी संख्या में सरकार ने अफसरों का तबादला किया पर इस सूची में भी इनका नाम नहीं आया। ऐसे में लंबे समय तक एक ही महत्वपूर्ण पद पर अधिकारियों की निरंतर पदस्थापना स्वाभाविक रूप से सवाल खड़े करती है। सामान्य प्रशासनिक व्यवस्था में बदलाव को इसलिए भी महत्वपूर्ण माना जाता है ताकि कामकाज में नई दृष्टि आए और किसी अधिकारी विशेष को लेकर स्थानीय सत्ता-संतुलन या प्रभाव का स्थायी तंत्र बनने की धारणा पैदा न हो।
हालांकि किसी अधिकारी का लंबे समय तक एक स्थान पर बने रहना अपने आप में यह साबित नहीं करता कि उसके पीछे किसी नेता का संरक्षण है। तबादला सरकार का प्रशासनिक विशेषाधिकार है और इसके पीछे कार्यक्षमता, योजनाओं की निरंतरता तथा अन्य कई कारण भी हो सकते हैं। लेकिन जब कार्यकाल असामान्य रूप से लंबा दिखाई दे तो सवाल पूछना भी स्वाभाविक है—और लोकतंत्र में सवालों का जवाब होना चाहिए।वैसे भी इन महाशय की कोई विशेष खासियत भी अब तक नजर नहीं आई है।पर सरकार में सेटिंग तगड़ी बनाकर रखने का फायदा इनको अब तक मिलता आ रहा है।वैसे चर्चा यह भी है कि अब तो कलेक्टर कार्यालय के कर्मचारी भी इनसे प्रताड़ित चुके है।वो भी चाहते है कि अब इनकी रवानगी हो ही जाए।कम हाइट के इस कलाकार से हम लोगों को कब मुक्ति मिलेगी।
अब सबसे दिलचस्प सवाल यही है—साय सरकार की अगली प्रशासनिक सर्जरी में इन ‘लंबी पारी’ वाले साहब का विकेट गिरेगा या वे फिर नॉट आउट लौटेंगे?या फिर इस महाशय को किसी बड़े जिले की जिम्मेदारी दी जाएगी।वैसे विभागीय काम से ज्यादा इनके बहुत से निजी किस्से कलेक्टर कार्यालय में सुने जा सकते है।
फिलहाल प्रशासनिक गलियारों में चुटकी यही ली जा रही है—
“सरकार में तबादले की सूची तो बदलती रहती है साहब…
बस कुछ नाम शायद स्थायी स्याही से लिखे होते हैं!”



