कोरबाछत्तीसगढ

चैतुरगढ़ मंदिर परिसर में वन विभाग का ‘हाई-प्रोफाइल हैंगआउट’! अफसरों की मौज-मस्ती से पवित्र क्षेत्र की गरिमा खतरे में

एसडीओ ने परिवार के नाम से रूम बुक कराया—रात को अफसरों की पार्टी का अड्डा बन गया रेस्ट हाउस**

कोरबा/चैतुरगढ़(छत्तीसगढ़ उजाला)माँ महिषासुर मर्दिनी के पवित्र धाम चैतुरगढ़ की शांति और श्रद्धा इन दिनों वन विभाग के कुछ अफसरों की मनमानी के आगे फीकी पड़ती दिखाई दे रही है। धार्मिक महत्व वाला यह क्षेत्र, जहाँ भक्त आध्यात्मिक सुकून पाने आते हैं, रात होते ही ‘हाई-प्रोफाइल हैंगआउट ज़ोन’ में तब्दील हो रहा है।



सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार, वन विभाग के एसडीओ ने अपने परिवार के नाम से चैतुरगढ़ रेस्ट हाउस में कमरा बुक कराया था, लेकिन रात होते ही हालात बिल्कुल अलग नजर आए। परिवार तो कहीं दिखाई नहीं दिया, बल्कि रेस्ट हाउस में अफसरों के परिचित युवकों की भीड़ पहुँच गई, और पूरे परिसर का माहौल अचानक पार्टी स्पॉट में बदल गया।

रात भर चला शोर-शराबा, शराब की बोतलें और चिल्लपों का माहौल

स्थानीय लोगों ने बताया कि कमरे में एंट्री लेते ही बोतलें खुल गईं, जोर-जोर से चिल्लाने की आवाजें आने लगीं और देर रात तक तेज शोर-शराबा चलता रहा। मंदिर क्षेत्र की पवित्रता को ताक पर रखकर खुलेआम मौज-मस्ती का यह दौर कई दिनों से जारी है।



रेंजर भी दिखे टोली के साथ—सरकारी गाड़ी पर पूछा तो बोले, “यह मेरी नहीं

मामले को और गंभीर बनाता है यह तथ्य कि रेस्ट हाउस के उपयोग को ‘केवल अधिकारियों के लिए’ बताने वाले रेंजर खुद भी पार्टीबाज़ टोली का हिस्सा बने दिखाई दिए। उनकी सरकारी गाड़ी भी रेस्ट हाउस के बाहर खड़ी देखी गई।
जब इस पर सवाल पूछा गया तो रेंजर ने चौंकाने वाला जवाब दिया—
“यह मेरी गाड़ी नहीं है, किसकी है पता करवाता हूँ।”

स्थानीयों की नाराज़गी–“धार्मिक धाम की गरिमा ख़तरे में”



चैतुरगढ़ के ग्रामीणों का कहना है कि इस तरह की गतिविधियाँ मंदिर क्षेत्र की पवित्रता को आहत कर रही हैं। आम लोगों को रेस्ट हाउस से दूर रखने वाले अधिकारी ही इसे अपनी निजी पार्टी स्पॉट की तरह इस्तेमाल कर रहे हैं।

बड़े सवाल खड़े—क्या चैतुरगढ़ रेस्ट हाउस अय्याशी का नया केन्द्र बन चुका है?

अब जनता के बीच एक ही सवाल गूंज रहा है—

क्या चैतुरगढ़ रेस्ट हाउस वन अफसरों का ‘हाई-प्रोफाइल अय्याशी केंद्र’ बन गया है?

क्षेत्र का विकास आज तक नहीं हुआ इस पर ध्यान देने की आवश्यकता हैं।

यदि एसडीओ ने परिवार के नाम पर बुकिंग करवाई थी, तो फिर रात में गैर-परिवार के युवक कैसे पहुँचे?

और सबसे महत्वपूर्ण—इस पूरे मामले पर कार्रवाई आखिर कब होगी?


धार्मिक स्थल की गरिमा और वन विभाग की साख दोनों पर सवाल उठते इस मामले में अब प्रशासनिक हस्तक्षेप की ज़रूरत महसूस की जा रही है।

प्रशांत गौतम

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