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अवॉर्ड की आड़ में घोटाले के पक्के निशान? RTI पर गोंडवाना फॉसिल पार्क के DFO की चुप्पी

मनेन्द्रगढ़ (छत्तीसगढ़ उजाला)
गोंडवाना फॉसिल पार्क—धरती के करोड़ों वर्षों पुराने इतिहास को समेटे यह धरोहर…
जिसे संरक्षित और विकसित करने की उपलब्धि पर एक वरिष्ठ अधिकारी ने मंच पर अवॉर्ड तो झटक लिया,
लेकिन जब उसी विकास का हिसाब-किताब मांगा गया—तो विभाग खामोशी की चट्टान बनकर खड़ा हो गया।

पार्क का दावा—विश्वस्तरीय पहचान दिलाने का।
लेकिन जमीनी हकीकत—हिसाब की गायब किताबों का विवाद।

आरटीआई से उठे सीधे-साधे सवाल
कितना बजट मिला? कहां खर्च हुआ? किस काम के लिए कितना भुगतान?
पर जवाब—या तो आया ही नहीं… और आया भी तो अधूरा, टालमटोल से भरा।

सूत्रों के अनुसार
पिछले कुछ वर्षों में लाखों का बजट जारी हुआ,
पर मौके पर दिखने वाला कार्य—उस खर्च का कहीं आसपास भी नहीं।
फाइलें सवालों के बोझ से दबने लगीं, और विभाग जवाबों से बचने।

यही चुप्पी अब शक पैदा कर रही है—
क्या गोंडवाना फॉसिल पार्क में केवल जीवाश्म ही गहराई में दफन नहीं,
खर्च के रहस्य भी वहीं दबे पड़े हैं?

बड़े सवाल

जब काम पारदर्शिता से हुआ है, तो हिसाब देने में डर कैसा?

अवॉर्ड लेने की बारी आई तो मंच सज गया,
लेकिन RTI की बारी आई तो दरवाज़े क्यों बंद हो गए?

क्या विकास की तस्वीर सिर्फ अवॉर्ड सर्मनी के फ़ोटों में चमकी है,
जबकि जमीन पर कागज़ी काम ही ज्यादा हुआ?

जहाँ करोड़ों साल पुरानी प्रकृति की कहानियाँ चट्टानों में दर्ज हैं,
वहीं आजकल सुर्खियों में है—गायब हिसाब की कहानी।

गोंडवाना फॉसिल पार्क के जीवाश्म सुरक्षित हों या न हों…
पर खर्च का जवाब जरूर खतरे में दिख रहा है।

प्रशांत गौतम

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