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JCB से हटाया था अतिक्रमण, अब फिर सरकारी जमीन पर कब्जा! 45 लाख में सौदे की चर्चा, RTO के बड़े अधिकारी का नाम आने से प्रशासन की चुप्पी पर सवाल

एक साल पहले जिस शासकीय जमीन को सरपंच, पंचायत प्रतिनिधियों और तहसील प्रशासन ने संयुक्त कार्रवाई कर अतिक्रमण मुक्त कराया था, उसी जमीन पर दोबारा कब्जा होने का आरोप है। अगस्त 2025 में JCB चलवाकर कब्जा हटाने वाली पंचायत अब खामोश क्यों है? तहसीलदार और SDM की कार्रवाई भी सवालों के घेरे में।

जी. पी. एम. (छत्तीसगढ़ उजाला)-ग्राम पंचायत पतगवां में शासकीय भूमि पर अतिक्रमण का मामला एक बार फिर सुर्खियों में है। जिस सरकारी जमीन को अगस्त 2025 में ग्राम पंचायत और राजस्व विभाग की संयुक्त कार्रवाई के दौरान JCB चलवाकर अतिक्रमण मुक्त कराया गया था, उसी जमीन पर आज फिर से कब्जा किए जाने की शिकायत सामने आ रही है। सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब एक बार प्रशासन ने इस जमीन को सरकारी मानते हुए अतिक्रमण हटाया था, तो आखिर दोबारा कब्जा कैसे हो गया?

मामला ग्राम पंचायत पतगवां के खसरा नंबर 874/2 से जुड़ा है। 28 अगस्त 2025 को तत्कालीन कार्रवाई के दौरान सरपंच, पंचों, तहसीलदार और पटवारी की मौजूदगी में शासकीय भूमि से अवैध कब्जा हटाया गया था। उस समय पंचायत की ओर से स्पष्ट संदेश दिया गया था कि सरकारी जमीन पर किसी भी प्रकार का अतिक्रमण बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। प्रशासनिक टीम ने JCB के माध्यम से निर्माण हटवाकर जमीन को अतिक्रमण मुक्त कराया था।

लेकिन अब हालात बदलते नजर आ रहे हैं। उसी भूमि पर दोबारा अतिक्रमण किए जाने के आरोप सामने आने के बावजूद राजस्व विभाग की ओर से प्रभावी कार्रवाई नहीं होने की बात कही जा रही है।

एक साल में ऐसा क्या बदल गया? सरपंच की भूमिका पर भी सवाल

इस पूरे मामले में ग्राम पंचायत के सरपंच की भूमिका भी चर्चा का विषय बन गई है। अगस्त 2025 में जब शासकीय जमीन को अतिक्रमण मुक्त कराने की कार्रवाई हुई थी, तब सरपंच और पंचायत प्रतिनिधियों ने सक्रिय भूमिका निभाई थी। पंचायत की विशेष बैठक में सरकारी जमीन को कब्जे से मुक्त कराने का निर्णय लिया गया था।

लेकिन अब उसी जमीन पर दोबारा अतिक्रमण की शिकायत के बावजूद पंचायत की ओर से पहले जैसी सक्रियता दिखाई नहीं देने की बात सामने आ रही है।

आखिर एक साल के भीतर ऐसा क्या बदल गया कि जिस अतिक्रमण के खिलाफ पंचायत ने प्रशासन के साथ मिलकर JCB चलवाई थी, आज उसी मामले में कार्रवाई की मांग कमजोर पड़ती दिखाई दे रही है? क्या पंचायत को दोबारा अतिक्रमण की जानकारी नहीं है या फिर किसी दबाव के चलते चुप्पी साध ली गई है? इन सवालों का जवाब मिलना जरूरी है।

45 लाख रुपये में सरकारी जमीन का सौदा? RTO के बड़े अधिकारी का नाम चर्चा में

इस मामले को लेकर स्थानीय स्तर पर एक और गंभीर चर्चा सामने आ रही है। सूत्रों के हवाले से दावा किया जा रहा है कि उक्त शासकीय भूमि पर कब्जे के आधार पर कथित तौर पर करीब 45 लाख रुपये में एक पक्ष से दूसरे पक्ष को सौदा किया गया है। इस कथित लेनदेन में RTO विभाग के एक बड़े अधिकारी का नाम भी चर्चा में बताया जा रहा है।

हालांकि, इस कथित सौदे और अधिकारी की संलिप्तता की स्वतंत्र पुष्टि होना अभी बाकी है। न ही उपलब्ध जानकारी के आधार पर यह कहा जा सकता है कि किसी अधिकारी ने वास्तव में जमीन खरीदी है या प्रशासनिक अधिकारियों को प्रभावित किया है।

लेकिन यदि सरकारी रिकॉर्ड में दर्ज जमीन को कब्जे के आधार पर लाखों रुपये में खरीदने-बेचने का मामला सही है, तो यह केवल अतिक्रमण का नहीं, बल्कि शासकीय संपत्ति के कथित अवैध हस्तांतरण का गंभीर विषय बन सकता है।

तहसीलदार और SDM की चुप्पी क्यों?

सबसे बड़ा सवाल राजस्व प्रशासन की कार्यप्रणाली पर है। अगस्त 2025 में इसी खसरे की जमीन को सरकारी मानकर अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई की गई थी। ऐसे में वर्तमान में दोबारा कब्जे की शिकायत सामने आने पर राजस्व विभाग की जिम्मेदारी बनती है कि वह मौके का निरीक्षण करे, राजस्व रिकॉर्ड का परीक्षण करे और नियमानुसार कार्रवाई करे।

यदि जमीन वास्तव में शासकीय है और दोबारा अतिक्रमण हुआ है, तो कार्रवाई में देरी क्यों? क्या तहसीलदार और SDM ने स्थल निरीक्षण कराया है? क्या दोबारा अतिक्रमण की शिकायत पर कोई प्रकरण दर्ज किया गया है? यदि कार्रवाई नहीं हुई तो उसका कारण क्या है?

प्रशासन से सीधे सवाल

अगस्त 2025 में जिस खसरा नंबर 874/2 पर JCB चलाकर अतिक्रमण हटाया गया था, क्या आज उस जमीन की वर्तमान स्थिति का पंचनामा बनाया गया है?

क्या कथित 45 लाख रुपये के सौदे की जांच होगी? क्या इसमें बताए जा रहे RTO अधिकारी की भूमिका की पुष्टि की जाएगी? क्या ग्राम पंचायत और राजस्व विभाग के जिम्मेदार अधिकारियों से जवाब मांगा जाएगा?

एक बार अतिक्रमण हटाकर सरकारी जमीन को सुरक्षित घोषित कर देना पर्याप्त नहीं है। उसकी दोबारा सुरक्षा और निगरानी भी प्रशासन की जिम्मेदारी है। पतगवां की इस जमीन पर उठ रहे सवालों का जवाब अब राजस्व प्रशासन को देना होगा।

प्रशांत गौतम

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