लालपुर उद्यान रोपणी में कृषक प्रशिक्षण संपन्न, 60 किसानों और महिलाओं ने सीखी आधुनिक उद्यानिकी तकनीकें

ड्रिप सिंचाई, मल्चिंग, पौध तैयार करने, ग्राफ्टिंग और मशरूम उत्पादन का दिया गया प्रशिक्षण, आय बढ़ाने के बताए गए उपाय
जी. पी. एम. (छत्तीसगढ़ उजाला)-किसानों को आधुनिक उद्यानिकी तकनीकों से जोड़ने, वैज्ञानिक पद्धति से खेती को बढ़ावा देने और उनकी आय में वृद्धि करने के उद्देश्य से शासकीय उद्यान रोपणी, लालपुर में 16 अक्टूबर 2026 को एक दिवसीय कृषक प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित किया गया। राज्यपोषित योजनांतर्गत आयोजित इस प्रशिक्षण में विकासखंड गौरेला के उद्यानिकी कृषकों एवं स्व-सहायता समूह की महिलाओं सहित कुल 60 प्रतिभागियों ने हिस्सा लिया। सुबह 10 बजे से शाम 5 बजे तक चले इस प्रशिक्षण में विशेषज्ञों ने उद्यानिकी फसलों की उन्नत उत्पादन तकनीकों, रोग एवं कीट प्रबंधन, पौध तैयार करने, फलदार पौधों के प्रवर्धन, मशरूम उत्पादन तथा विभागीय योजनाओं की विस्तृत जानकारी दी।
प्रशिक्षण कार्यक्रम का आयोजन चार सत्रों में किया गया, जिसमें प्रतिभागियों को सैद्धांतिक जानकारी के साथ-साथ विभिन्न तकनीकों का व्यावहारिक अभ्यास भी कराया गया। कार्यक्रम का उद्देश्य किसानों को नवीन कृषि तकनीकों से अवगत कराकर उत्पादन क्षमता बढ़ाने, खेती की लागत कम करने और आय के नए स्रोत विकसित करने के लिए प्रोत्साहित करना रहा।
ड्रिप सिंचाई और मल्चिंग से उत्पादन बढ़ाने की जानकारी
प्रशिक्षण के प्रथम सत्र में मुख्य अतिथियों का स्वागत किया गया। इसके बाद वरिष्ठ उद्यान विकास अधिकारी श्री अर्जुन सिंह मरावी ने कृषकों को उद्यानिकी फसलों की आधुनिक उत्पादन तकनीकों की जानकारी दी। उन्होंने ड्रिप सिंचाई और मल्चिंग तकनीक के महत्व को समझाते हुए बताया कि इन तकनीकों के उपयोग से जल संरक्षण, फसलों की बेहतर देखभाल और उत्पादन लागत में कमी लाने में मदद मिल सकती है। साथ ही सब्जियों की उन्नत खेती के तरीकों और इनके माध्यम से कृषकों की आय बढ़ाने की संभावनाओं पर भी विस्तार से चर्चा की गई।
गुणवत्तायुक्त पौध तैयार करने और रोग-कीट नियंत्रण का प्रशिक्षण
द्वितीय सत्र में उद्यान प्रभारी श्री ठाकुर मुकुंद माधव सिंह ने कोकोपीट एवं खाद के मिश्रण से सब्जियों की स्वस्थ और गुणवत्तायुक्त पौध (थरहा) तैयार करने की विधि बताई। उन्होंने सब्जी फसलों में लगने वाले प्रमुख रोगों एवं कीटों की पहचान, उनके प्रभावी प्रबंधन और वैज्ञानिक तरीके से फसल सुरक्षा के उपायों की जानकारी दी। इस दौरान किसानों को गुणवत्तायुक्त पौध तैयार करने तथा फसलों को रोग एवं कीटों से सुरक्षित रखने के व्यावहारिक पहलुओं से अवगत कराया गया।
आम की ग्राफ्टिंग और लीची-नींबू में गुटी बांधने का अभ्यास
मध्याह्न भोजन के बाद आयोजित तृतीय सत्र में फलदार पौधों के प्रवर्धन की तकनीकों का प्रायोगिक प्रदर्शन किया गया। इसमें आम के पौधों में ग्राफ्टिंग यानी कलम बांधने तथा लीची और नींबू के पौधों में गुटी बांधने की विधि समझाई गई। प्रशिक्षणार्थियों को स्वयं आम के पौधों में ग्राफ्टिंग करने और लीची के पौधों में गुटी बांधने का अभ्यास कराया गया। इससे किसानों को इन तकनीकों को अपने खेतों और बगीचों में अपनाने के लिए व्यावहारिक जानकारी मिली।
मशरूम उत्पादन और फसल बीमा की दी गई जानकारी
प्रशिक्षण के अंतिम सत्र में मशरूम उत्पादन की विभिन्न पद्धतियों, उद्यानिकी के माध्यम से अतिरिक्त आय अर्जित करने की संभावनाओं तथा विभागीय योजनाओं की जानकारी दी गई। इस अवसर पर एआईसी के जिला समन्वयक श्री विमल चौधरी ने उद्यानिकी फसलों के लिए फसल बीमा के महत्व, आवश्यकता और उससे मिलने वाले लाभों के बारे में विस्तारपूर्वक बताया। उन्होंने किसानों को फसल संबंधी जोखिमों से सुरक्षा के लिए बीमा के प्रावधानों की जानकारी लेने तथा पात्रतानुसार संबंधित योजनाओं का लाभ उठाने के लिए प्रेरित किया।
जनप्रतिनिधियों की रही उपस्थिति
कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में श्रीमती सीता मुकेश सोनवानी, सभापति, कृषि स्थायी समिति, गौरेला; श्रीमती सविता राठौर, जनपद सदस्य; श्रीमती इंदरनिया बाई, सरपंच, ग्राम पंचायत लालपुर तथा श्री पप्पू नरवरिया, वरिष्ठ नागरिक, लालपुर उपस्थित रहे। अतिथियों ने अपने संबोधन में किसानों को आधुनिक उद्यानिकी तकनीकों को अपनाने, वैज्ञानिक पद्धति से खेती करने और विभागीय योजनाओं का लाभ लेने के लिए प्रोत्साहित किया।
कार्यक्रम के अंत में वरिष्ठ उद्यान विकास अधिकारी श्री अर्जुन सिंह मरावी ने अतिथियों, प्रशिक्षकों एवं सभी प्रतिभागियों के प्रति आभार व्यक्त किया। इसके साथ ही एक दिवसीय कृषक प्रशिक्षण कार्यक्रम का समापन हुआ।

इस प्रशिक्षण के माध्यम से किसानों एवं स्व-सहायता समूह की महिलाओं को उद्यानिकी उत्पादन की आधुनिक तकनीकों, पौध तैयार करने, फलदार पौधों के प्रवर्धन, रोग-कीट प्रबंधन, मशरूम उत्पादन और फसल बीमा से जुड़ी उपयोगी जानकारियां प्राप्त हुईं। ये तकनीकें खेती को अधिक वैज्ञानिक एवं लाभकारी बनाने तथा कृषकों की आय बढ़ाने की दिशा में सहायक हो सकती हैं।




