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भय के साए में शिक्षक, शिक्षा व्यवस्था से जुड़ा बड़ा सवाल! अनुशासन, अधिकार और जिम्मेदारी के बीच फंसा शिक्षक; पढ़ाने से ज्यादा कागजी कामों में उलझने की स्थिति पर उठे सवाल

बात बेबाक

आज इस धरती पर सबसे ज्यादा निरीह प्राणी अगर कोई है तो वह शायद शिक्षक है। जिसका मूल काम शिक्षा देना है, लेकिन बदलती व्यवस्था में वह शिक्षा के अलावा इतने दायित्वों में उलझा हुआ है कि पढ़ाना ही कई बार उसके लिए सबसे मुश्किल काम बन जाता है।

स्थिति यह है कि शिक्षक न किसी विद्यार्थी को फेल करने की स्वतंत्रता रखता है, न डांटने-फटकारने की, न अनुशासन के लिए कठोर कदम उठाने की। नकल रोकने की कोशिश करे तो विवाद, अनुशासन बनाए रखने की कोशिश करे तो शिकायत और बच्चे को डांट दे तो अभिभावकों की नाराजगी। ऐसे में सवाल उठता है कि जिस बच्चे को उसके माता-पिता घर पर नियंत्रित नहीं कर पा रहे, उसे शिक्षक चालीस-पचास विद्यार्थियों की कक्षा में किस तरह संभाले?

शिक्षक को राष्ट्र निर्माता कहा जाता है। वह मोमबत्ती की तरह स्वयं जलकर विद्यार्थियों का भविष्य गढ़ता है, लेकिन मौजूदा व्यवस्था में उसके सामने अधिकारों और जिम्मेदारियों का ऐसा असंतुलन दिखाई देता है, जो चिंता पैदा करता है। यह समस्या केवल गांव के स्कूलों तक सीमित नहीं है, बल्कि बड़े और प्रतिष्ठित शिक्षण संस्थानों तक भी अनुशासन और शिक्षक के अधिकारों को लेकर बहस पहुंच चुकी है।

‘भय बिनु होइ न प्रीति’ की जगह शिक्षक खुद भयभीत

कभी शिक्षक के हाथ में किताब और चॉक के साथ अनुशासन की छड़ी भी हुआ करती थी। जरूरत पड़ने पर डांटने-फटकारने का नैतिक अधिकार भी माना जाता था। समय बदला और बच्चों के अधिकारों तथा सुरक्षा को लेकर संवेदनशीलता बढ़ी। यह बदलाव आवश्यक भी है, लेकिन सवाल यह है कि विद्यार्थी के अधिकारों की रक्षा और शिक्षक के सम्मान व अधिकारों के बीच संतुलन कहां है?

आज शिक्षक के सामने स्थिति कई बार ऐसी बन जाती है कि बच्चा पढ़े या न पढ़े, गृहकार्य करे या न करे, कॉपी की जगह मोबाइल देखे—शिक्षक को समझाने तक ही सीमित रहना पड़ता है।

“बेटा, ऐसा मत करो, पढ़ाई में ध्यान दो।”

इसके आगे बढ़ते ही शिक्षक को शिकायत, जांच या विभागीय कार्रवाई की चिंता सताने लगती है। बच्चा घर जाकर रो दे तो अगले दिन अभिभावक विद्यालय पहुंच जाते हैं—“हमारा बच्चा ऐसा नहीं है, आपने उसे डांटा कैसे?”

नतीजा यह कि शिक्षक अनुशासन और संवेदनशीलता के बीच लगातार संतुलन बनाने की कोशिश करता रहता है।

गाड़ी चलाने की जिम्मेदारी, लेकिन स्टीयरिंग पर हाथ रखने की मनाही!

आज की शिक्षा व्यवस्था शिक्षक से अनुशासन भी चाहती है, अच्छे परिणाम भी और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा की गारंटी भी। लेकिन इसके साथ उसके हाथ बांध दिए जाएं तो सवाल उठना स्वाभाविक है।

इसे एक उदाहरण से समझा जा सकता है—गुरुजी से कहा जा रहा है कि गाड़ी भी चलाइए, लेकिन स्टीयरिंग पर हाथ लगाने की अनुमति नहीं है।

शिक्षक के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही है कि वह विद्यार्थियों को किस तरह अनुशासित करे, बिना इस भय के कि उसकी किसी कार्रवाई को उसके खिलाफ इस्तेमाल किया जा सकता है।

पढ़ाई से ज्यादा पोर्टल और रिपोर्ट का बोझ

शिक्षक की दूसरी बड़ी समस्या कागजी और ऑनलाइन कामों का बढ़ता बोझ है। स्कूल में शिक्षक बच्चों को पढ़ाने जाता है, लेकिन उसके हिस्से में कभी सर्वे, कभी प्रशिक्षण, कभी बैठक, कभी रिपोर्ट, कभी ऑनलाइन पोर्टल तो कभी अलग-अलग एप पर जानकारी अपडेट करने जैसे कार्य भी आते रहते हैं।

कई बार शिक्षक के लिए यह सवाल अधिक महत्वपूर्ण हो जाता है कि आज कौन-सा पोर्टल अपडेट करना है, किस एप पर उपस्थिति दर्ज करनी है और कौन-सी रिपोर्ट भेजनी बाकी है।

यदि इस अतिरिक्त बोझ को कम किया जाए तो शिक्षक के पास विद्यार्थियों को पढ़ाने, उनकी समस्याओं को समझने और उनकी शैक्षणिक गुणवत्ता सुधारने के लिए अधिक समय हो सकता है।

शिक्षक के अधिकार और विद्यार्थी के अधिकार में संतुलन जरूरी

बच्चों की सुरक्षा और सम्मान सर्वोपरि हैं। किसी भी विद्यार्थी के साथ हिंसा या अपमान को उचित नहीं ठहराया जा सकता। लेकिन इसके साथ यह भी जरूरी है कि शिक्षक को सम्मानजनक, स्पष्ट और प्रभावी अनुशासनात्मक अधिकार दिए जाएं, ताकि वह बिना भय के कक्षा का संचालन कर सके।

सवाल शिक्षक के हाथ में फिर से डंडा देने का नहीं है। सवाल है कि उसे ऐसी व्यवस्था मिले जिसमें जिम्मेदारी के साथ स्पष्ट अधिकार भी हों और अच्छे कार्य के लिए संस्थागत संरक्षण भी।

क्योंकि जिस व्यवस्था में शिक्षक हर क्षण शिकायत और कार्रवाई के भय में काम करेगा, वहां उससे निर्भीक होकर विद्यार्थियों का भविष्य गढ़ने की अपेक्षा करना अपने आप में विरोधाभास है।

कल की किताब में कहीं यह न लिखना पड़े…

शिक्षा व्यवस्था पर विचार करते हुए सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या हम शिक्षक को केवल आदेशों का पालन करने वाला कर्मचारी बना रहे हैं या वास्तव में उसे राष्ट्र निर्माता की भूमिका निभाने के लिए आवश्यक सम्मान, समय और अधिकार भी दे रहे हैं?

कहीं ऐसा न हो कि आने वाली पीढ़ी की पाठ्यपुस्तक में लिखा मिले—

“एक समय शिक्षक का मुख्य कार्य शिक्षा देना था।”

और बच्चे पूछें—“सर, ‘था’ का मतलब समझ नहीं आया!”

और अंत में…

ऐसे माहौल में दुआ क्या है, दवा क्या है,

जहां क़ातिल ही ख़ुद पूछे कि हुआ क्या है।

प्रशांत गौतम

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