सुशासन की चौखट पर भटकता कार्यकर्ता, कांग्रेस की विचारधारा को पल्लवित करते दो जिले के नौकरशाह? साय सरकार में अफसरशाही के कथित रवैये पर सियासी गलियारों में चर्चाएं तेज, भाजपा कार्यकर्ताओं की सुनवाई को लेकर उठ रहे सवाल
रायपुर(छत्तीसगढ़ उजाला)-रायपुर से लेकर जिलों तक सत्ता और संगठन के बीच बेहतर तालमेल की बात लगातार कही जाती रही है। सरकार सुशासन और पारदर्शी प्रशासन को अपनी प्राथमिकताओं में शामिल बताती है। लेकिन कुछ जिलों को लेकर अब ऐसी चर्चाएं सामने आ रही हैं, जो इन दावों के बीच कई सवाल खड़े करती हैं।
सियासी गलियारों में चर्चा है कि दो जिलों में पदस्थ कलेक्टरों की कार्यशैली को लेकर भाजपा से जुड़े कार्यकर्ताओं में असंतोष है, जबकि कांग्रेस से जुड़े लोगों की कथित तौर पर ज्यादा सुनवाई होने की बातें कही जा रही हैं। यहां तक कहा जा रहा है कि कुछ अधिकारियों के कार्यालयों में कांग्रेस से जुड़े लोगों की बैठकें और आवाजाही चर्चा का विषय बनी हुई है।
हालांकि इन चर्चाओं की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन यदि शिकायतें लगातार सामने आ रही हैं तो उनके तथ्यात्मक परीक्षण की जरूरत जरूर महसूस की जा रही है।
सत्ता बदली, लेकिन दफ्तरों के गलियारों में तस्वीर क्यों नहीं बदली?
भाजपा की सरकार बनने के बाद उसके कार्यकर्ताओं को उम्मीद थी कि शासन-प्रशासन में उनकी समस्याओं की सहज सुनवाई होगी। चुनाव के दौरान बूथ से लेकर गांव और शहर की गलियों तक संगठन के लिए मेहनत करने वाले कार्यकर्ताओं को उम्मीद थी कि सरकार बनने के बाद प्रशासनिक स्तर पर उनकी समस्याओं का समाधान प्राथमिकता से होगा।
लेकिन कुछ कार्यकर्ताओं का कहना है कि छोटे-छोटे कामों के लिए भी उन्हें कलेक्टर कार्यालयों के चक्कर लगाने पड़ रहे हैं।
कभी आवेदन की प्रति मांगी जाती है, कभी फाइल आगे बढ़ने का आश्वासन मिलता है और कभी अगली तारीख। शिकायत यह भी है कि लगातार प्रयासों के बावजूद काम की मंजिल दूर दिखाई देती है।
दूसरी ओर, इन्हीं जिलों को लेकर राजनीतिक चर्चाओं में यह दावा सुनाई देता है कि कांग्रेस से जुड़े कुछ लोगों के लिए प्रशासनिक रास्ते अपेक्षाकृत आसान नजर आते हैं।
क्या राजनीतिक पहचान बन रही है प्रशासनिक व्यवहार का आधार?
सबसे बड़ा सवाल यही है कि प्रशासनिक व्यवस्था में किसी नागरिक या जनप्रतिनिधि की राजनीतिक पहचान का कोई प्रभाव होना चाहिए या नहीं?
सरकारी व्यवस्था का मूल सिद्धांत यही है कि काम नियम, पात्रता और आवश्यकता के आधार पर हो।
ऐसे में यदि किसी जिले में भाजपा कार्यकर्ताओं को अधिकारियों से मिलने, अपनी समस्याएं रखने या उनके निराकरण के लिए बार-बार प्रयास करना पड़ रहा है और दूसरी ओर किसी राजनीतिक दल से जुड़े लोगों की कथित रूप से सहज पहुंच की चर्चा है, तो यह स्थिति निश्चित तौर पर जांच और समीक्षा का विषय बनती है।
यह भी सवाल उठ रहा है कि संबंधित अधिकारियों की तैनाती किन प्रशासनिक आधारों पर हुई और उनके कामकाज को लेकर जनप्रतिनिधियों तथा आम नागरिकों की क्या प्रतिक्रिया है?
संघ मुख्यालय तक पहुंची चर्चा?
राजनीतिक हलकों में यह भी चर्चा है कि संबंधित अधिकारियों की कार्यशैली को लेकर उठ रही बातें अब संगठन के वरिष्ठ स्तर तक पहुंच चुकी हैं। हालांकि इस संबंध में किसी आधिकारिक कार्रवाई या निर्णय की पुष्टि नहीं हुई है।
इसलिए फिलहाल यह कहना जल्दबाजी होगी कि इन चर्चाओं का कोई प्रशासनिक या संगठनात्मक परिणाम सामने आएगा। लेकिन इतना जरूर है कि यदि कार्यकर्ताओं के बीच असंतोष की बातें लगातार उठ रही हैं, तो भाजपा संगठन के लिए इसे नजरअंदाज करना आसान नहीं होगा।
कार्यकर्ता आखिर किसके लिए लड़ा था?
चुनाव के समय यही कार्यकर्ता धूप में घूमता है, गांव-गांव जाता है, बूथ संभालता है, पोस्टर लगाता है, मतदाताओं तक पहुंचता है और संगठन के लिए अपना समय और ऊर्जा लगाता है।
सरकार बनने के बाद वही कार्यकर्ता यदि किसी छोटे से काम के लिए सरकारी कार्यालय की चौखट पर खड़ा नजर आए और उसे बार-बार आवेदन, दस्तावेज और अगली तारीख के भरोसे लौटना पड़े, तो सवाल केवल एक व्यक्ति का नहीं रह जाता।
सवाल संगठन और सरकार के बीच उस संवाद का बन जाता है, जिसकी चर्चा सत्ता बनने के बाद सबसे ज्यादा होती है।
भाजपा संगठन के सामने भी चुनौती
भाजपा के लिए कार्यकर्ता केवल चुनावी समय का साथी नहीं है। वही संगठन की सबसे महत्वपूर्ण कड़ी है। ऐसे में यदि किसी जिले में कार्यकर्ताओं के बीच प्रशासन को लेकर असंतोष की भावना बन रही है, तो संगठन को शिकायतों की वास्तविकता की पड़ताल करनी चाहिए।
सिर्फ राजनीतिक पहचान के आधार पर किसी अधिकारी या किसी पक्ष पर निष्कर्ष निकालना भी उचित नहीं होगा। लेकिन शिकायतों को नजरअंदाज करना भी समाधान नहीं है।
निष्पक्ष समीक्षा, जनप्रतिनिधियों से संवाद और शिकायतों की तथ्यात्मक जांच के जरिए स्थिति स्पष्ट की जा सकती है।
सुशासन की असली परीक्षा फाइलों में नहीं, सुनवाई में
सुशासन का अर्थ केवल योजनाओं और नारों तक सीमित नहीं है। सुशासन की असली कसौटी यह है कि आम नागरिक को कार्यालय में कितनी सहजता से सुना जाता है, उसकी फाइल कितनी पारदर्शिता से आगे बढ़ती है और नियम सभी के लिए समान रूप से लागू होते हैं।
सरकार किसी भी दल की हो, प्रशासन की जिम्मेदारी सभी नागरिकों के प्रति समान रहती है।
इसलिए जिन जिलों को लेकर ऐसी राजनीतिक चर्चाएं चल रही हैं, वहां अधिकारियों की कार्यशैली, शिकायतों के निराकरण, जनप्रतिनिधियों से संवाद और आम लोगों की पहुंच की निष्पक्ष समीक्षा होना जरूरी है।
अब सवाल यही है—क्या इन चर्चाओं को महज राजनीतिक कानाफूसी मानकर छोड़ दिया जाएगा, या तथ्यों की पड़ताल कर वास्तविक स्थिति सामने लाई जाएगी?
क्योंकि सत्ता की असली परीक्षा केवल कुर्सियों पर बैठे अधिकारियों से नहीं, बल्कि उस आम कार्यकर्ता और नागरिक की सुनवाई से होती है जो व्यवस्था के दरवाजे पर अपनी उम्मीद लेकर पहुंचता है।
व्यंग्य-कविता : फाइल का अपना राज
कुर्सी पर बैठे साहब, फाइलों का दरबार,
किसकी अर्जी पहले खुले—यही बड़ा विचार।
कार्यकर्ता द्वार खड़ा है, हाथ में कागज थाम,
हर खिड़की से लौट रहा, लेकर नया पैगाम।
चुनावों में साथ चले थे, गलियों और मैदान,
सत्ता आई तो दूर हुए दफ्तर के गलियान।
कहते हैं—सबका काम होगा, नियमों के अनुसार,
फिर क्यों कुछ की राह सरल, कुछ की लंबी कतार?
सुशासन की पहचान है निष्पक्ष व्यवहार,
सबकी सुनवाई एक-सी—यही राजधर्म का सार।
वरना नारों की गूंज में दब जाएगा सवाल—
सरकार किसी की भी हो, जनता रहे न बेहाल।



