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*संगठन में बदलाव की बयार…..अब सत्ता की बारी?…….* *स्मृति ईरानी की एंट्री से सियासी हलचल तेज,साय झारखंड रवाना; मंत्रिमंडल में बदलाव की अटकलों ने बढ़ाई कई नेताओं की धड़कनें*
•सियासत•
रायपुर छत्तीसगढ़ उजाला।
छत्तीसगढ़ भाजपा में लंबे समय से बड़े संगठनात्मक फेरबदल की चर्चा चल रही थी। आखिरकार केंद्रीय नेतृत्व ने बदलाव का बिगुल फूंकते हुए प्रदेश की राजनीतिक फिजा में नई हलचल पैदा कर दी। तेजतर्रार नेत्री और पूर्व केंद्रीय मंत्री स्मृति ईरानी को छत्तीसगढ़ भाजपा की प्रदेश प्रभारी की जिम्मेदारी सौंपे जाने के बाद पार्टी के भीतर सियासी समीकरण तेजी से बदलते दिखाई दे रहे हैं।
इसके साथ ही लंबे समय से प्रदेश संगठन की धुरी माने जाने वाले पवन साय को छत्तीसगढ़ से हटाकर झारखंड की जिम्मेदारी दी गई है। उनकी जगह कर्मवीर सिंह को प्रदेश संगठन की जवाबदेही सौंपी गई है।वैसे कर्मवीर सिंह उत्तरप्रदेश के मथुरा से है। संगठन को मजबूत करने में पारंगत है।संगठन में हुए इस बदलाव को सामान्य प्रशासनिक फेरबदल मानना राजनीतिक नासमझी होगी। भाजपा में जब संगठन की कुर्सियां बदलती हैं, तब सत्ता के गलियारों में बैठे लोगों की कुर्सियां भी अपने आप हिलने लगती हैं।कहा जा रहा है कि नए प्रदेश प्रभारी और संगठन मंत्री को केवल बैठकें लेने तथा पुष्पगुच्छ स्वीकार करने के लिए नहीं भेजा गया है। उनके सामने सरकार, संगठन और नाराज कार्यकर्ताओं के बीच बढ़ती दूरी को कम करने की बड़ी चुनौती होगी। पार्टी कार्यालय में भले ही सब कुछ अनुशासित दिखाई दे, लेकिन भीतरखाने की चर्चा कुछ और ही कहानी सुनाती है।
संगठन की घंटी बजी, मंत्रियों की नींद उड़ी!
दिल्ली की मोदी सरकार में संभावित मंत्रिमंडल विस्तार की चर्चाओं के बीच छत्तीसगढ़ में भी साय मंत्रिमंडल के पुनर्गठन की अटकलें तेज हो गई हैं।वर्तमान सरकार में मुख्यमंत्री की छवि साफ सुथरी है।वही जनता के बीच में मंत्रियों की छवि बहुत ज्यादा खराब है।सरकार की अच्छी छवि बनाने के लिए पार्टी संगठन बड़ा फैसला कर सकता है।राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि साय सरकार में कृषि मंत्री रामविचार नेताम, महिला एवं बाल विकास मंत्री लक्ष्मी राजवाड़े, राजस्व मंत्री टंकराम वर्मा और स्वास्थ्य मंत्री श्याम बिहारी जायसवाल के विभागों अथवा मंत्री पद को लेकर तरह-तरह की चर्चाएं चल रही हैं।
इन चर्चाओं में कितनी सच्चाई है, यह केंद्रीय नेतृत्व और मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ही जानते होंगे, लेकिन संभावित बदलाव की आहट ने कई मंत्रियों की धड़कनें अवश्य बढ़ा दी हैं। अब मंत्री फाइलों से अधिक दिल्ली और संगठन की गतिविधियों पर नजर रख रहे होंगे। राजनीति में कब रिपोर्ट कार्ड मांगा जाए और कब कुर्सी के नीचे से कालीन खींच लिया जाए—इसकी सूचना पहले से किसी को नहीं मिलती।
कार्यकर्ता की नाराजगी, सरकार से भी होंगे सवाल……
आज प्रदेश भाजपा के सामने सबसे बड़ी चुनौती विपक्ष से अधिक अपने कार्यकर्ताओं की नाराजगी मानी जा रही है। जिन कार्यकर्ताओं ने चुनाव के समय बूथ संभाला, घर-घर झंडे लगाए और पार्टी के पक्ष में वातावरण बनाया, उनमें से कई अब स्वयं को सत्ता और संगठन से दूर महसूस कर रहे हैं।कार्यकर्ताओं के बीच यह शिकायत सुनाई देती है कि सरकार बनने के बाद संघर्ष के दिनों के साथी पीछे छूट गए और सत्ता के नए शुभचिंतक आगे की कतार में आ गए।पुराने चेहरों को आयोग और बोर्ड में बैठा दिया।पार्टी कार्यालयों में पुराने कार्यकर्ता प्रतीक्षा करते दिखाई देते हैं, जबकि सत्ता के मौसम वैज्ञानिक सीधे बड़े दरवाजों से प्रवेश कर रहे हैं।
हालत कुछ ऐसी है—



