छत्तीसगढ

*सियासत*………. *बिलासपुर में पोस्टर पॉलिटिक्स: किसका जलवा, किसका फरमान?………* *वर्चस्व की लड़ाई में जन्मदिन के फ्लैक्स बने सियासी चर्चा का विषय*

°सियासत°

 

“शहर की दीवारों पर जब तस्वीरें बोलने लगती हैं,
तब सत्ता के गलियारों में कुर्सियां डोलने लगती हैं।
फ्लैक्स तो कुछ घंटों में उतार लिए जाते हैं जनाब,
मगर उनके पीछे की सियासत दूर तक दिखाई देती है।”

*छत्तीसगढ़ उजाला रायपुर*
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बिलासपुर की राजनीति में वर्चस्व की कहानी कोई नई नहीं है।चाहे बात कांग्रेस की सत्ता की हो या भाजपा की।गुटो की राजनीति को न्यायधानी की जनता ने हमेशा से देखा है। यहां समय-समय पर चेहरे बदलते रहे, जिम्मेदारियां बदलती रहीं और सत्ता का केंद्र भी बदलता रहा। एक दौर था जब बिलासपुर की राजनीति में पूर्व मंत्री एवं वर्तमान भाजपा विधायक अमर अग्रवाल का दबदबा निर्विवाद माना जाता था। शहर की राजनीतिक दिशा से लेकर प्रशासनिक गतिविधियों तक उनके प्रभाव की चर्चा हुआ करती थी।प्रदेश सरकार के कद्दावर मंत्रियों में इनकी गिनती हुआ करती थी।परंतु राजनीति में समय कभी किसी के लिए स्थायी नहीं रहता। आज परिस्थितियां ऐसी बदली हैं, जिसकी कल्पना शायद पार्टी के पुराने राजनीतिक दिग्गजों ने भी नहीं की होगी।
वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य में उपमुख्यमंत्री अरुण साव एक मजबूत शक्ति-केंद्र के रूप में उभर कर सामने आए हैं। सरकार में महत्वपूर्ण विभागों की जिम्मेदारी संभालने के साथ ही साय सरकार में उपमुख्यमंत्री भी है। उनका राजनीतिक और स्थानीय जुड़ाव बिलासपुर से होने के कारण शहर की सत्ता में उनका प्रभाव स्वाभाविक रूप से अब दिखाई देने लगा है। ऐसे में बिलासपुर की राजनीति अब केवल एक केंद्र के आसपास घूमती हुई नजर नहीं आती।सियासत का पुराना दस्तूर है—एक ही शहर में जब दो प्रभावशाली नेताओं का कद बड़ा हो, तो उनके समर्थकों के बीच उत्साह के साथ प्रतिस्पर्धा भी जन्म लेती है। यह प्रतिस्पर्धा कभी बैठकों में दिखाई देती है, कभी स्वागत कार्यक्रमों में और कभी शहर के चौक-चौराहों पर लगे पोस्टर एवं फ्लैक्स अपनी मौन भाषा में बहुत कुछ कह जाते हैं।
पूर्व मंत्री अमर अग्रवाल के जन्मदिन पर उनके समर्थकों ने शहर को शुभकामना संदेशों वाले फ्लैक्स से सजाकर अपने नेता का राजनीतिक जलवा दिखाने का प्रयास किया। समर्थकों का जोश ऐसा था मानो हर फ्लैक्स यह घोषणा कर रहा हो कि शहर की राजनीति में पुराने खिलाड़ी का प्रभाव अभी समाप्त नहीं हुआ है। लेकिन बताया जा रहा है कि नगर निगम के अमले ने कई फ्लैक्स हटाकर जब्त कर लिए। इसके बाद शहर में जन्मदिन की शुभकामनाओं से अधिक चर्चा इस बात की होने लगी कि आखिर फ्लैक्स हटाने का निर्देश कहां से आया?

“जन्मदिन था नेता का, समर्थकों में जोश अपार,
चौराहों पर सज गया शुभकामनाओं का संसार।
निगम की गाड़ी आई, समेट ले गई सम्मान—
अब शहर पूछ रहा है, आखिर किसका था फरमान?”

नगर निगम यदि अवैध फ्लैक्स और होर्डिंग हटाता है, तो यह उसका अधिकार ही नहीं बल्कि जिम्मेदारी भी है। किंतु सवाल तब खड़े होते हैं जब कार्रवाई में समानता दिखाई न दे। क्या शहर में लगे सभी अवैध पोस्टर हटाए गए या कार्रवाई के केंद्र में किसी एक नेता के चित्र वाले फ्लैक्स ही रहे? क्या यह नियमित प्रशासनिक अभियान था अथवा किसी विशेष निर्देश के बाद सक्रियता दिखाई गई? इन प्रश्नों का उत्तर नगर निगम को पारदर्शिता के साथ देना चाहिए।
राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि फ्लैक्स पर हुई यह कार्रवाई केवल नियम-कायदों तक सीमित मामला नहीं है। हालांकि किसी ठोस प्रमाण के बिना इसे किसी नेता के निर्देश से जोड़ना उचित नहीं होगा, लेकिन सत्ता की राजनीति को समझने वाले इस घटनाक्रम में अपने-अपने अर्थ तलाश रहे हैं। लोग पूछ रहे हैं कि यदि आदेश वास्तव में “ऊपर” से आया था तो वह ऊपर आखिर कितना ऊपर था?
भाजपा अनुशासन और संगठनात्मक एकता की बात करती है, लेकिन बिलासपुर में उसके नेताओं के समर्थकों के बीच चल रही खींचतान अब पर्दे के पीछे छिपती दिखाई नहीं देती। नेता भले ही सार्वजनिक मंचों से एकता की तस्वीर प्रस्तुत करें, पर समर्थकों की गतिविधियां कई बार अंदरूनी परिस्थितियों की कहानी स्वयं कह देती हैं। राजनीति में फ्लैक्स केवल कपड़े या प्लास्टिक का टुकड़ा नहीं होता; उस पर लगी तस्वीर नेता की सक्रियता, समर्थकों की संख्या और क्षेत्र में उसके प्रभाव का सार्वजनिक प्रदर्शन भी होती है।

“तस्वीर उतरी खंभे से, चर्चा चढ़ी बाजार,
चेहरों पर मुस्कान रही, भीतर मची तकरार।
दल एक, झंडा एक और नारा भी एक समान—
फिर क्यों हर खेमे में बैठा अपना-अपना सुल्तान?”

अमर अग्रवाल लंबे समय से बिलासपुर की राजनीति का प्रमुख चेहरा रहे हैं, जबकि अरुण साव सत्ता और संगठन में बढ़ते प्रभाव के साथ नई राजनीतिक धुरी बनकर सामने आए हैं। दोनों नेताओं में अमर अग्रवाल ज्यादा अनुभवी हैं और सार्वजनिक रूप से अपनी मर्यादा बनाए रखते हैं।वैसे दोनों का आपसी विवाद प्रत्यक्ष रूप से सामने तो नहीं आया है।इसके बावजूद समर्थकों के बीच वर्चस्व दिखाने की होड़ शहर की राजनीति को लगातार गर्म कर रही है।
कभी-कभी राजनीति में एक छोटा-सा फ्लैक्स भी बड़ी कहानी लिख देता है। निगम के वाहन में जाते हुए पोस्टरों ने शायद शहर को यह बता दिया कि बिलासपुर में संघर्ष केवल जमीन, विकास या जनसमस्याओं का नहीं, बल्कि राजनीतिक प्रभाव और पहचान का भी है। अब देखना यह है कि यह “पोस्टर पॉलिटिक्स” यहीं समाप्त होती है अथवा आने वाले दिनों में वर्चस्व की लड़ाई कोई नया रंग दिखाती है।

“सत्ता का मौसम है साहब, कब करवट बदल जाए,
*कल जिसका शहर था सारा, आज उसका पोस्टर उतर जाए।
सियासत में स्थायी न ताज है, न किसी का दरबार—
समय ही तय करता है आखिर, किसका कितना अधिकार।”

Anil Mishra

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