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गरीब के मकान पर सियासत की कई मंजिलें! प्रेस क्लब में 80 मिनट तक चली आंकड़ों की बरसात, नेताओं की बहस के बीच आवास मित्रों की मजदूरी और गरीब की चाबी का सवाल पीछे छूटा

रायपुर(छत्तीसगढ़ उजाला)-छत्तीसगढ़ की राजनीति में धुरविरोधी माने जाने वाले और अपनी-अपनी पार्टियों के दिग्गज नेता पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल और उपमुख्यमंत्री विजय शर्मा विधानसभा से बाहर पहली बार आमने-सामने नजर आए। मंच बना रायपुर प्रेस क्लब और मुद्दा था प्रधानमंत्री आवास योजना को लेकर एक-दूसरे को दी गई चुनौती का।

गरीबों के आवास को लेकर चल रही सियासत में नेताओं की आंकड़ेबाजी देखकर एक बात जरूर समझ आई—छत्तीसगढ़ में गरीब का मकान भले ही सिंगल मंजिल का हो, लेकिन उस पर होने वाली राजनीति कई मंजिल ऊपर पहुंच चुकी है।

सवाल यह भी है कि जब घर गरीब का बनेगा, तो उसकी दीवार पर श्रेय किसका लिखा जाएगा?

80 मिनट तक आंकड़ों की बरसात

रायपुर प्रेस क्लब में करीब 80 मिनट तक दिग्गज नेताओं की जुबान से आंकड़ों की ऐसी बरसात हुई कि जनता भी कुछ देर के लिए दिग्भ्रमित नजर आई। कितने मकान स्वीकृत हुए, कितने बने, कितने अधूरे हैं, पोर्टल कब खुला और कब बंद हुआ, केंद्र ने कितना दिया और राज्य ने कितना किया—हर आंकड़े की अपनी राजनीतिक छतरी थी।

लेकिन इन आंकड़ों की आंधी के बीच प्रधानमंत्री आवास योजना से जुड़े कई जमीनी सवाल पीछे छूटते दिखाई दिए।

कथित कमीशनखोरी के आरोप, आधे-अधूरे बने आवास, आवास निर्माण के बाद भुगतान को लेकर परेशान हितग्राही, ठेकेदारों से जुड़े विवाद, आवास मित्रों की लंबित मजदूरी और स्थानीय स्तर पर कार्रवाई की मांग जैसे मुद्दे बहस के केंद्र में उतने दिखाई नहीं दिए, जितने राजनीतिक आंकड़े दिखाई दिए।

गरीब शायद मन ही मन यही सोच रहा होगा—

“मोर झोपड़ी के ऊपर नाम काखर छपही, ओला बाद मं बताहु… पहिली ये बतावव कि चाबी कब मिलही?”

आवास मित्रों का सवाल कौन पूछेगा?

प्रधानमंत्री आवास योजना सिर्फ गरीबों को पक्का मकान देने तक सीमित नहीं है। इसके क्रियान्वयन में गांव-गांव काम करने वाले आवास मित्रों की भी महत्वपूर्ण भूमिका रहती है।

इन आवास मित्रों का काम हितग्राहियों तक योजना की जानकारी पहुंचाने से लेकर आवास निर्माण की प्रगति की निगरानी और संबंधित प्रक्रिया में सहयोग करने तक होता है।

लेकिन सवाल यह है कि जब मकान बन गया, जब आंकड़ा तैयार हो गया और जब नेता अपनी-अपनी उपलब्धियां गिनाने लगे, तब उन आवास मित्रों की मजदूरी का सवाल कहां गया?

आवास मित्र शायद यही कह रहे होंगे—

“मय झोपड़ी ल पक्का आवास बनवा डारेव, आंकड़ा ल बाद मं बताहु… अभी ये बताओ कि आवास बन गए त हमर रोजी-मजूरी कब मिलही मालिक?”

बहस मकान की नहीं, श्रेय की हो गई

राजनीति में सवाल शायद अब सिर्फ इस बात का नहीं रह गया है कि गरीब के सिर पर छत कब आएगी। सवाल यह भी बन गया है कि उस छत और चाबी पर किस पार्टी के श्रेय का टैग लगेगा।

पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल अपने कार्यकाल के आंकड़ों और केंद्र से जुड़े मुद्दों का हवाला देते रहे, जबकि उपमुख्यमंत्री विजय शर्मा मौजूदा सरकार की प्रगति और आवास निर्माण की गति का पक्ष रखते रहे।

दोनों तरफ से तर्कों की ईंटें आती-जाती रहीं। आंकड़ों का गुना-भाग लगाया गया और आरोप-प्रत्यारोप का सीमेंट भी जमकर लगाया गया।

नतीजा यह हुआ कि राजनीति की इमारत तो मजबूत होती दिखाई दी, लेकिन गरीब के मकान की चाबी का सवाल फिर भी वहीं खड़ा रहा।

एक्सेल शीट में सेल चाहिए या गरीब को घर?

बहस में सबसे दिलचस्प बात यह रही कि प्रधानमंत्री आवास योजना में चर्चा मकान से ज्यादा आंकड़ों की होती रही।

ऐसा लगा मानो गरीब को घर नहीं, एक्सेल शीट में एक सेल चाहिए।

एक पक्ष कहता रहा कि केंद्र ने सहयोग नहीं किया, फिर भी हमने इतना काम कराया। दूसरे पक्ष से जवाब आया कि आपने उतना नहीं कराया।

पहला पक्ष आंकड़ों की व्याख्या करता रहा, दूसरा पक्ष अपने कार्यकाल और वर्तमान सरकार की उपलब्धियों का हिसाब बताता रहा।

और इस पूरी लाइव बहस के बीच जनता शायद यही सोचती रही—

“भइया, तुमन दुनों अपन-अपन गणित लगावत रहव, मोला तो बस चार दीवार अउ एक छत दे देव। घर के दीवार अउ चाबी मं नाम काखरो लिखावव, वोट के बेरा मं हम बताबो कउन बनाइस हमर घर ल।”

आवास योजना की असली तस्वीर आंकड़ों से आगे है

प्रधानमंत्री आवास योजना का मूल उद्देश्य गरीब परिवारों को पक्का आवास उपलब्ध कराना है। इसलिए इसकी सफलता का सबसे बड़ा पैमाना यह होना चाहिए कि पात्र परिवार को समय पर आवास मिले, निर्माण पूरा हो, किस्तों का भुगतान समय पर हो और अंततः हितग्राही के हाथ में उसके घर की चाबी पहुंचे।

इसके साथ ही योजना के जमीनी क्रियान्वयन में लगे आवास मित्रों को समय पर उनकी मजदूरी मिले, यह भी प्रशासनिक व्यवस्था की जवाबदेही का हिस्सा है।

क्योंकि आवास मित्रों के बिना गांव-गांव तक योजना की निगरानी और क्रियान्वयन की तस्वीर अधूरी है।

गरीब को बहस नहीं, घर चाहिए

गरीब को न तो प्रेस क्लब में 80 मिनट की बहस चाहिए और न ही आंकड़ों की आतिशबाजी।

उसे चाहिए—पक्का मकान, समय पर किस्त और हाथ में चाबी।

श्रेय की राजनीति के लिए नेताओं के पास वैसे भी कई योजनाएं हैं। वहां जरूरत होती है एक बयानबाजी की, एक एआई जनरेटेड पोस्टर की, एक तड़कता-फड़कता भाषण देने की और फिर जरूरत पड़ने पर धरना-प्रदर्शन या पुतला दहन की।

लेकिन गरीब की जिंदगी में इन सबका महत्व तभी है, जब उसके सिर पर पक्की छत हो।

आंकड़ों की राजनीति अपनी जगह है, दावों और प्रतिदावों की सियासत भी अपनी जगह है। मगर आखिरकार किसी भी आवास योजना की असली तस्वीर सरकारी फाइल या राजनीतिक मंच पर नहीं, बल्कि उस गरीब परिवार के घर के दरवाजे पर दिखाई देती है, जिसके हाथ में चाबी पहुंची है या नहीं।

क्योंकि मकान की दीवारें किसी पार्टी की नहीं होतीं—वे उस परिवार की होती हैं, जो बरसों से पक्की छत का इंतजार कर रहा है।

और अंत में…

तू ना समेटा कर ये जुल्फें अपनी,कि मुझे बहुत पसंद है इनमें उलझना।

प्रशांत गौतम

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