ब्रेकिंग न्यूज

अस्सी के दशक के खुमार में नेता और नौकरशाह! क्या सोशल मीडिया के बहाने सियासत भी अतीत के दौर में लौट रही है?

रायपुर(छत्तीसगढ़ उजाला)-आम जनता आज रोजगार, बेहतर सड़क, चौबीस घंटे बिजली-पानी, आधुनिक स्वास्थ्य सुविधाएं, स्मार्ट शहर, निवेश और सुरक्षित भविष्य की उम्मीद लगाए बैठी है। लेकिन दूसरी ओर सोशल मीडिया पर इन दिनों अस्सी के दशक की यादों का ऐसा खुमार चढ़ा हुआ है कि नेता से लेकर नौकरशाह तक पुरानी तस्वीरों के रंग में रंगे नजर आ रहे हैं। कोई पुराने जमाने की वेशभूषा में दिखाई दे रहा है, तो कोई हाथ में पुराना टेलीफोन लिए बीते दौर की यादें ताजा कर रहा है। किसी ने श्वेत-श्याम तस्वीर के जरिए अपनी सादगी तलाश ली है तो कोई पुराने दफ्तर, सरकारी टेबल-कुर्सी और उस दौर की जीवनशैली को सोशल मीडिया पर फिर से जीवंत कर रहा है।

सोशल मीडिया की टाइमलाइन देखकर एक पल को ऐसा लगता है जैसे डिजिटल क्रांति, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और तकनीक के इस दौर में अचानक समय का पहिया उल्टा घूम गया हो। दिल्ली से लेकर छत्तीसगढ़ तक अस्सी के दशक की तस्वीरों की ऐसी बहार आई है कि सवाल उठना स्वाभाविक है—क्या यह सिर्फ सोशल मीडिया का ट्रेंड है या फिर हमारी सियासत भी अतीत की गलियों में लौटने लगी है?

तस्वीरें पुरानी, लेकिन सवाल आज के

पुरानी तस्वीरें निश्चित तौर पर यादों को संजोने का खूबसूरत माध्यम हैं। बीता हुआ दौर व्यक्ति के जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा होता है और उसे याद करना स्वाभाविक भी है। लेकिन जब राजनीति के मंच पर भी पुरानी तस्वीरें, पुराने अंदाज, पुराने नारे और पुराने तौर-तरीके हावी होने लगें, तब सवाल तस्वीरों से आगे बढ़कर सोच पर पहुंच जाता है।

छत्तीसगढ़ के राजनीतिक गलियारों में भी इन दिनों कुछ नेताओं की सोशल मीडिया सक्रियता को देखकर ऐसा लगता है कि वे अतीत के दौर को फिर से याद करने में खास दिलचस्पी ले रहे हैं। पुराने जमाने की तस्वीरें, उस दौर की पोशाक और सादगी को सामने रखकर वर्तमान से एक भावनात्मक रिश्ता बनाने की कोशिश दिखाई देती है।

लेकिन सवाल यह है कि क्या पुरानी तस्वीरों से आज के मतदाता के नए सवालों का जवाब मिल सकता है?

जनता को ‘पुरानी तस्वीर’ नहीं, नया भविष्य चाहिए

आज का मतदाता पहले से कहीं ज्यादा जागरूक है। उसके हाथ में स्मार्टफोन है, दुनिया की जानकारी उसकी उंगलियों पर है और वह नेताओं से केवल भाषण नहीं बल्कि परिणाम चाहता है। युवा रोजगार की बात कर रहा है, किसान अपनी आय और बाजार की चिंता कर रहा है, शहरों में रहने वाला नागरिक यातायात, प्रदूषण, पानी और बेहतर बुनियादी सुविधाएं चाहता है।

ऐसे समय में अगर राजनीतिक विमर्श बार-बार पुराने दौर की तस्वीरों और नारों तक सीमित दिखाई दे, तो सवाल उठना लाजिमी है।

मतदाता को दूरदर्शन का दौर याद दिलाने से ज्यादा जरूरी है कि उसे डिजिटल दौर का भरोसा दिया जाए।

आज की राजनीति में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, डिजिटल गवर्नेंस, साइबर सुरक्षा, रोजगार, स्टार्टअप, निवेश, बेहतर शिक्षा और आधुनिक स्वास्थ्य सेवाओं जैसे विषयों पर गंभीर बहस की जरूरत है। ऐसे में सवाल यह भी है कि क्या राजनीतिक दल आने वाले चुनावों में इन्हीं मुद्दों को केंद्र में रखेंगे या फिर सोशल मीडिया के ट्रेंड के सहारे पुराने दौर की भावनाओं को ही चुनावी हथियार बनाया जाएगा?

नौकरशाही भी ट्रेंड में पीछे नहीं

दिलचस्प बात यह है कि इस पूरे ट्रेंड में केवल राजनेता ही नहीं, बल्कि नौकरशाही से जुड़े लोग भी सोशल मीडिया पर अपनी पुरानी तस्वीरों के जरिए अतीत की यादें साझा करते दिखाई दे रहे हैं। किसी के लिए यह व्यक्तिगत स्मृति हो सकती है तो किसी के लिए सोशल मीडिया की मौजूदा लोकप्रियता का हिस्सा।

लेकिन यहां भी एक सवाल अपनी जगह खड़ा है—क्या प्रशासन की पहचान भी अतीत की सादगी से होगी या भविष्य की दक्षता से?

आज जनता सरकारी कार्यालय में कम समय, ऑनलाइन सेवाएं, पारदर्शिता, जवाबदेही और त्वरित समाधान चाहती है। नागरिक यह नहीं देखना चाहता कि अधिकारी अस्सी के दशक में कैसे दिखते थे; वह यह देखना चाहता है कि आज उसकी शिकायत कितनी जल्दी दूर होती है।

कहीं भविष्य की तस्वीर धुंधली तो नहीं?

सियासत में स्मृतियों का अपना महत्व है। पुराने दौर की तस्वीरें जनता के साथ भावनात्मक जुड़ाव पैदा कर सकती हैं। लेकिन राजनीति का मूल काम अतीत की तस्वीरों को चमकाना नहीं, बल्कि भविष्य की तस्वीर बनाना है।

यही वजह है कि सोशल मीडिया पर चल रहे इस ट्रेंड ने एक दिलचस्प सवाल खड़ा कर दिया है—क्या नेताओं के पास भविष्य की ऐसी तस्वीर है, जिसे वे जनता के सामने रख सकें?

कहीं ऐसा तो नहीं कि भविष्य के कठिन सवालों से बचने के लिए अतीत की आसान यादों का सहारा लिया जा रहा है? पुरानी तस्वीर में न बेरोजगारी का सवाल दिखाई देता है, न महंगाई की चिंता, न सड़क की समस्या और न ही स्वास्थ्य एवं शिक्षा की चुनौतियां। तस्वीर सिर्फ स्मृति देती है, समाधान नहीं।

चुनावी राजनीति में क्या होगा अगला कदम?

आगामी चुनावों की आहट के बीच सोशल मीडिया अब राजनीतिक प्रचार का सबसे बड़ा मंच बन चुका है। ऐसे में यह देखना दिलचस्प होगा कि राजनीतिक दल इस नए ट्रेंड को किस तरह इस्तेमाल करते हैं।

क्या चुनावी प्रचार में पुराने दौर की भावनात्मक तस्वीरें और किस्से ज्यादा दिखाई देंगे? क्या नेता अपनी पुरानी राजनीतिक यात्रा को नए मतदाताओं के सामने रखेंगे? या फिर चुनावी मैदान में रोजगार, विकास, निवेश, शिक्षा, स्वास्थ्य, कानून-व्यवस्था और आधुनिक बुनियादी सुविधाओं जैसे वास्तविक मुद्दे ही निर्णायक भूमिका निभाएंगे?

फिलहाल तो सोशल मीडिया पर अस्सी के दशक की तस्वीरों का खुमार खूब दिखाई दे रहा है। नेता हों या नौकरशाह, हर कोई अपने-अपने अंदाज में बीते दौर की झलक दिखा रहा है।

लेकिन जनता का सवाल शायद इससे कहीं बड़ा है—

“तस्वीर चाहे अस्सी के दशक की हो, लेकिन हमारा भविष्य किस दशक का होगा?”

क्योंकि यादों में लौटना बुरा नहीं है, लेकिन देश और प्रदेश की सियासत अगर भविष्य की राह छोड़कर बार-बार अतीत में ही लौटती रही, तो फिर सवाल सिर्फ तस्वीरों का नहीं, पूरी राजनीतिक सोच का होगा।

प्रशांत गौतम

Related Articles

Back to top button