अब सियासी पारी खेलने को तैयार ‘रिटायर्ड साहब’! भाजपा से बढ़ रही पूर्व नौकरशाहों की नजदीकी, विधानसभा चुनाव में टिकट की उम्मीद लगाए बैठे कुछ रिटायर्ड अधिकारी
रायपुर(छत्तीसगढ़ उजाला)-छत्तीसगढ़ की सियासत में अब सरकारी नौकरी से रिटायर होने के बाद राजनीति की ओर कदम बढ़ाने वाले पूर्व नौकरशाहों को लेकर चर्चाओं का दौर शुरू हो गया है। वर्षों तक प्रशासनिक व्यवस्था का हिस्सा रहे कुछ पूर्व अधिकारी अब कथित तौर पर राजनीतिक पारी शुरू करने की तैयारी में बताए जा रहे हैं। राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि इनमें से कुछ की नजदीकी भाजपा से बढ़ रही है और वे आगामी विधानसभा चुनाव में पार्टी के टिकट पर चुनाव लड़ने की संभावनाएं तलाश रहे हैं।
फाइलों से निकलकर अब सियासी मैदान की ओर
सरकारी सेवा में लंबे समय तक प्रशासनिक जिम्मेदारियां संभालने वाले अधिकारियों के लिए राजनीति कोई बिल्कुल नई दुनिया नहीं है। सेवाकाल के दौरान शासन, प्रशासन और जनप्रतिनिधियों के साथ काम करने का अनुभव, अधिकारियों और राजनीतिक हलकों में बने संपर्क तथा क्षेत्रीय समीकरणों की समझ—इन सबको अब कुछ पूर्व अधिकारी अपनी राजनीतिक पूंजी के तौर पर देख रहे हैं।
चर्चा है कि रिटायरमेंट के बाद कुछ ‘साहब’ अब सरकारी फाइलों के बजाय राजनीतिक फाइलों में अपनी जगह तलाश रहे हैं। जिनके एक आदेश या हस्ताक्षर का कभी प्रशासनिक असर होता था, वे अब जनता के बीच अपनी पहचान बनाने और राजनीतिक संगठन में जगह मजबूत करने की कवायद में जुटे बताए जा रहे हैं।
भाजपा की ओर क्यों बढ़ रही नजर?
भाजपा पहले भी प्रशासनिक सेवा से राजनीति में आए चेहरों को संगठन और चुनावी राजनीति में अवसर देती रही है। कुछ पूर्व अधिकारियों ने चुनावी राजनीति में सफलता हासिल की, तो कुछ को अपेक्षित राजनीतिक सफलता नहीं मिल सकी। बावजूद इसके, प्रशासनिक पृष्ठभूमि वाले चेहरों को राजनीति में मौका मिलने के पुराने प्रयोग ने सेवानिवृत्त अधिकारियों के बीच नई उम्मीद जरूर पैदा की है।
यही वजह है कि राजनीतिक हलकों में ऐसी चर्चाएं तेज हैं कि कुछ रिटायर्ड अधिकारी भाजपा के वरिष्ठ नेताओं से संपर्क बढ़ा रहे हैं। सामाजिक कार्यक्रमों में सक्रियता, सार्वजनिक आयोजनों में मौजूदगी और विभिन्न वर्गों से मेल-मुलाकात को भी इसी राजनीतिक तैयारी से जोड़कर देखा जा रहा है। हालांकि, इनमें से किसी ने अब तक सार्वजनिक तौर पर विधानसभा चुनाव लड़ने की अपनी मंशा जाहिर नहीं की है।
प्रशासनिक अनुभव बनाम चुनावी राजनीति
पूर्व नौकरशाहों के सामने सबसे बड़ा सवाल यही है कि प्रशासनिक अनुभव क्या चुनावी राजनीति में वोट में बदल पाएगा? सरकारी सेवा में आदेश जारी करना और चुनावी मैदान में जनता का विश्वास हासिल करना दो बिल्कुल अलग भूमिकाएं हैं।
नौकरशाही में जहां पद और अधिकार के साथ निर्णय लिए जाते हैं, वहीं राजनीति में संगठन, कार्यकर्ताओं और मतदाताओं के बीच लगातार संवाद और स्वीकार्यता जरूरी होती है। ऐसे में रिटायरमेंट के बाद सीधे चुनावी मैदान में उतरने की तैयारी कर रहे पूर्व अधिकारियों के लिए सबसे बड़ी चुनौती अपनी प्रशासनिक पहचान को राजनीतिक स्वीकार्यता में बदलना होगी।
पुराने कार्यकर्ताओं की दावेदारी भी बड़ी चुनौती
भाजपा में विधानसभा टिकट के लिए केवल नए दावेदार ही नहीं, बल्कि वर्षों से संगठन के लिए काम कर रहे पुराने कार्यकर्ता भी अपनी दावेदारी रखते हैं। बूथ स्तर से लेकर मंडल और जिला संगठन तक सक्रिय रहने वाले कार्यकर्ताओं के बीच टिकट की उम्मीद स्वाभाविक है।
ऐसे में यदि कोई सेवानिवृत्त अधिकारी सीधे चुनावी टिकट की दावेदारी लेकर सामने आता है तो संगठन के पुराने कार्यकर्ताओं की प्रतिक्रिया भी महत्वपूर्ण होगी। पार्टी नेतृत्व को एक तरफ पूर्व अधिकारी के अनुभव और सामाजिक प्रभाव का आकलन करना होगा, तो दूसरी तरफ वर्षों से संगठन के लिए काम कर रहे कार्यकर्ताओं की भावनाओं और स्थानीय राजनीतिक समीकरणों को भी देखना होगा।
‘साहब’ के लिए कुर्सी से जनता तक का सफर आसान नहीं
राजनीतिक चर्चा में एक सवाल यह भी उठ रहा है कि प्रशासनिक कुर्सी पर बैठकर जनता से दूरी बनाए रखने वाले अधिकारी क्या चुनावी राजनीति में उसी जनता के बीच सहजता से जगह बना पाएंगे? सरकारी कार्यालय में मिलने के लिए समय लेने वाला व्यक्ति चुनाव के दौरान घर-घर जाकर वोट मांगता है—यह बदलाव जितना दिलचस्प है, उतना ही चुनौतीपूर्ण भी।
राजनीति में सिर्फ संपर्क और प्रशासनिक अनुभव पर्याप्त नहीं होते। यहां कार्यकर्ताओं का साथ, संगठन का भरोसा, स्थानीय समीकरण और सबसे बढ़कर जनता की स्वीकार्यता निर्णायक भूमिका निभाती है।
कहीं टिकट की आस, कहीं ‘राजनीतिक वनवास’!
फिलहाल पूर्व नौकरशाहों की संभावित राजनीतिक सक्रियता को लेकर चर्चाएं ही ज्यादा हैं। कुछ नामों को लेकर राजनीतिक गलियारों में अटकलें जरूर हैं, लेकिन अंतिम तस्वीर पार्टी स्तर पर निर्णय और संभावित उम्मीदवारों की घोषणा के बाद ही साफ होगी।
अब सवाल यह है कि भाजपा ऐसे कितने ‘रिटायर्ड साहबों’ को चुनावी मैदान में उतारने का मौका देती है और कितनों को संगठन की जिम्मेदारी तक सीमित रखती है। क्योंकि राजनीति में एंट्री आसान हो सकती है, लेकिन टिकट हासिल करना और चुनाव जीतना दो अलग-अलग कसौटियां हैं।
फिलहाल इतना जरूर है कि छत्तीसगढ़ की सियासत में कुछ सेवानिवृत्त नौकरशाहों की सक्रियता ने राजनीतिक चर्चाओं को गर्म कर दिया है। सरकारी सेवा की पारी पूरी करने के बाद अब कुछ ‘साहब’ जनसेवा की नई पारी खेलने का सपना देख रहे हैं। फर्क सिर्फ इतना है कि पहले उनके हाथ में सरकारी फाइलें थीं, अब उम्मीद है कि हाथ में पार्टी का झंडा और सामने जनता होगी।
आखिर राजनीति में रिटायरमेंट नहीं होता—बस कुर्सी बदल जाती है!



