“शिक्षा विभाग में ‘सेटिंग सिंडिकेट’ का बड़ा खेल? प्राचार्य बिलासपुर में संलग्न, “व्याख्याता जंग बहादुर चौहान” का ब्लॉक बदलकर गुरुकुल छात्रावास में वर्षों से कब्जा… विभागीय कार्यप्रणाली पर उठे गंभीर सवाल

गौरेला-पेंड्रा-मरवाही(छत्तीसगढ़ उजाला)-जिले की शिक्षा व्यवस्था एक बार फिर सवालों के घेरे में है। विकासखंड पेंड्रा अंतर्गत शासकीय हाई स्कूल बचरवार में पदस्थ व्याख्याता जंग बहादुर चौहान को लेकर गंभीर आरोप सामने आए हैं। आरोप है कि संबंधित व्याख्याता पिछले लगभग तीन वर्षों से अपनी मूल पदस्थापना वाले स्कूल से दूर हैं, लेकिन इसके बावजूद लगातार वेतन आहरित किया जा रहा है। मामला सामने आने के बाद शिक्षा विभाग की कार्यप्रणाली, निगरानी व्यवस्था और प्रशासनिक जवाबदेही पर बड़े सवाल खड़े हो गए हैं।
जानकारी के अनुसार, जंग बहादुर चौहान की पदस्थापना शासकीय हाई स्कूल बचरवार में है, लेकिन वे लंबे समय से सामान्य छात्रावास गुरुकुल में प्रभारी अधीक्षक के रूप में कार्यरत बताए जा रहे हैं। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब संबंधित व्याख्याता नियमित रूप से स्कूल में उपस्थित ही नहीं हो रहे, तो वहां विद्यार्थियों की पढ़ाई आखिर कैसे संचालित हो रही है? क्या बच्चों की शिक्षा भगवान भरोसे चल रही है या विभाग ने जानबूझकर आंखें मूंद रखी हैं?
सूत्रों के मुताबिक इस पूरे मामले की शिकायत पूर्व में तत्कालीन कलेक्टर तक भी पहुंच चुकी थी। शिकायत के बाद कथित रूप से यह निर्देश दिए गए थे कि संबंधित संस्था से वास्तविक उपस्थिति प्रमाण पत्र मिलने के बाद ही वेतन संबंधी प्रक्रिया पूरी की जाए। लेकिन यदि इसके बावजूद लगातार वेतन जारी होता रहा, तो सवाल उठना लाजिमी है कि आखिर उपस्थिति प्रमाण पत्र किस आधार पर जारी किए गए? क्या बिना वास्तविक उपस्थिति के दस्तावेज तैयार किए गए या फिर पूरा मामला विभागीय मिलीभगत का परिणाम है?
स्थानीय स्तर पर चर्चा यह भी है कि संबंधित व्याख्याता खुले तौर पर यह कहते फिरते हैं कि “सिस्टम में उनकी अच्छी पकड़ है, इसलिए उन पर कोई कार्रवाई नहीं होगी।” यदि यह दावा सही है, तो यह न केवल प्रशासनिक व्यवस्था पर सीधा सवाल है, बल्कि शिक्षा विभाग की साख पर भी बड़ा धब्बा माना जा रहा है। लोगों का कहना है कि जब एक शिक्षक खुलेआम व्यवस्था को चुनौती देता नजर आए और विभाग मौन बना रहे, तो फिर नियम-कायदों की बात करना सिर्फ दिखावा बनकर रह जाता है।
मामले का एक और अहम पहलू यह है कि विकासखंड पेंड्रा में पदस्थ एक व्याख्याता को गौरेला क्षेत्र के सामान्य छात्रावास गुरुकुल में प्रभारी अधीक्षक की जिम्मेदारी आखिर किन परिस्थितियों में सौंपी गई? क्या गौरेला क्षेत्र में योग्य कर्मचारियों की कमी थी या फिर किसी विशेष प्रभाव और पहुंच के चलते यह व्यवस्था बनाई गई? यदि यह केवल अस्थायी व्यवस्था थी, तो फिर तीन वर्षों तक इसे जारी रखने की अनुमति किसने दी?
ग्रामीणों और अभिभावकों में इस पूरे मामले को लेकर भारी नाराजगी है। उनका कहना है कि सरकारी स्कूल पहले ही शिक्षकों की कमी से जूझ रहे हैं। कई स्कूल एक या दो शिक्षकों के भरोसे संचालित हो रहे हैं। ऐसे में यदि पदस्थ शिक्षक ही वर्षों तक स्कूल से दूर रहें, तो बच्चों की पढ़ाई और भविष्य दोनों प्रभावित होना तय है।
अभिभावकों का आरोप है कि एक ओर सरकार गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और बेहतर शिक्षा व्यवस्था के बड़े-बड़े दावे करती है, वहीं दूसरी ओर जमीनी स्तर पर शिक्षक स्कूलों से गायब हैं और विभाग कार्रवाई करने के बजाय मौन साधे बैठा है। लोगों का कहना है कि छोटे कर्मचारियों पर मामूली गलती में तत्काल कार्रवाई हो जाती है, लेकिन प्रभावशाली लोगों के मामलों में नियमों को ठंडे बस्ते में डाल दिया जाता है।
शिक्षा विभाग की भूमिका भी अब सवालों के घेरे में है। यदि संबंधित व्याख्याता तीन वर्षों से स्कूल नहीं जा रहे थे, तो ब्लॉक शिक्षा अधिकारी, संकुल स्तर के अधिकारी और स्कूल प्रबंधन आखिर क्या कर रहे थे? क्या किसी ने वास्तविक निरीक्षण किया? यदि निरीक्षण हुआ तो रिपोर्ट में क्या दर्ज किया गया? और यदि निरीक्षण ही नहीं हुआ, तो यह प्रशासनिक लापरवाही का गंभीर मामला माना जाएगा।
अब पूरे मामले में लोगों की नजर जिला प्रशासन और शिक्षा विभाग पर टिकी हुई है। क्षेत्रवासियों की मांग है कि मामले की निष्पक्ष जांच कराई जाए, उपस्थिति रजिस्टर और वेतन भुगतान रिकॉर्ड का सत्यापन किया जाए तथा यदि अनियमितता पाई जाती है तो जिम्मेदार अधिकारियों और कर्मचारियों पर कठोर कार्रवाई सुनिश्चित की जाए।



