03 Dec 2019

राजस्थान की सियासत में कम होता राजे का वजूद....

By EditorTaaza Khabar

जयपुर |
सियासत के साज पर अपनी धुन का लोहा मनवा चुकीं वसुंधरा राजे क्या अब गुज़रे ज़माने के कद्दावरों की जमात में पंहुचा दी जाएँगी? प्रदेश भाजपा अध्यक्ष सतीश पूनिया की प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से हालिया मुलाकात के नतीजे तो इसी बात की तरफ संकेत करते हैं।

सूत्रों का कहना है कि प्रधानमंत्री से लगभग 30 मिनट की मुलाकात में सतीश पूनिया ने उप-चुनावों और निकाय चुनावों में पार्टी के खराब प्रदर्शन की नज़ीर पेश की। उन्होंने बताया कि उप-चुनावों में सक्रिय रहना तो दरकिनार, राजे ने पिछले तीन महीने से सांगठनिक गतिविधियों से भी दूरी बनाये रखी है। सूत्रों का कहना है कि मोदी ने पूनिया के शिकवा-शिकायतों को पूरी तफसील और संजीदगी के साथ सुना। मौके पर ही एक बड़ा फैसला लेते हुए मोदी ने पूनिया को यह कहते हुए ‘फ्री हैंड’ दे दिया कि आप एक नयी टीम तैयार करें और संगठन को मज़बूत करें। किस्सा-कोताह समझें तो प्रदेश के भाजपा हलकों में फैलती-पसरती इन चर्चाओं को अंतिम सत्य नहीं माना जा सकता कि वसुंधरा राजे का रुतबा बदस्तूर कायम है।

राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि हर गुज़रते दिनों के साथ यह और साफ होता गया कि चुनावी पराजय के बाद सक्रिय होने की बजाय वसुंधरा राजे ने खामोशी अिख्तयार कर ली। आज भी वे कार्यकर्ताओं से दूरी बनाये हुए हैं। सर्वाधिक अप्रिय तथ्य तो यह है कि सतीश पूनिया को प्रदेश अध्यक्ष बनाये जाने के दौरान पार्टी आलाकमान ने राजे को कतई भरोसे में नहीं लिया। सूत्रों का कहना है कि सतीश पूनिया कोटा के सांसद और लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला के निकटस्थों में गिने जाते हैं। बिरला और वसुंधरा के बीच सियासी खटास तो जग-ज़ाहिर है।

विश्लेषकों का कहना है कि ऐसे में इन अटकलों का कोई मतलब नहीं रह जाता कि भाजपा के पास अनुभवी नेताओं की कमी के मद्देनज़र राजे को केन्द्रीय मंत्रिमंडल में शामिल किया जा सकता है। लेकिन क्या सब कुछ वैसा ही हो रहा है, जैसे खाँचे गढ़े जा रहे हैं? नवंबर के शुरुआती पखवाड़े की खबरों पर नज़र डालें, तो तथ्यों की एक जुदा तस्वीर नज़र आती है, इसके मद्देनज़र क्या शनिवार 2 नवंबर को पूनिया की राजे से मुलाकात को रस्मी मुलाकात माना जाना चाहिए?

सूत्रों का कहना है कि पूनिया ने राजे के राजकीय आवास पर जाकर मुलाकात करते हुए किरण बेदी की लिखी हुई पुस्तक- ‘यह संभव है’ तथा देवदत्त पटनायक द्वारा रची ‘रामायण बनाम महाभारत’ पुस्तक भेंट की। सूत्रों का कहना है कि दोनों के बीच निकाय चुनावों की तैयारियों और संगठन चुनावों पर चर्चा हुई। विश्लेषकों का कहना है कि वसुंधरा राजे का मिज़ाज आँकना आसान नहीं है। लेकिन यह तस्वीर तो पूनिया की प्रधानमंत्री मोदी के साथ मुलाकात से सर्वथा उलट है। क्या पूनिया सियासी विवशताओं के चलते हकीकत से मुँह चुरा रहे थे?

बहरहाल मोदी की हिदायत पर अमल करते हुए प्रदेश अध्यक्ष सतीश पूनिया सांगठनिक चुनाव करवा चुके हैं। दिसंबर में गठित होने वाली नयी कार्यकारिणी इस सवाल का सटीक जवाब हो सकता है कि राजे का रुतबा आज भी कायम है। उनके लिए इतिहास के पन्नों में सिमटने का वक्त आ गया है? लेकिन इस मुहाने पर वसुंधरा के राजनीतिक राजनामचे की इबारत बाँच चुके रणनीतिकार इन सम्भावनाओं से इत्तेफाक नहीं रखते उनका कहना है कि सियासी अनश्चितता के अपशकुनी पखेरुओं को उड़ाने का उन्हें खासा तजुर्बा है।


विश्लेषकों का कहना है कि पिछली बार आरएसएस ने प्रदेश के राजनीतिक मानक तय करते हुए वसुंधरा के दावों से उलट चुनावी कमान थामने का ऐलान कर दिया था; लेकिन राजे की गुर्राहट ने इस ऐलान को यह कहते हुए खारिज कर दिया कि मैं कहीं नहीं जाने वाली; चुनाव मेरे ही नेतृत्त्व में लड़े जाएँगे। यही हुआ भी और इस ठस्से के साथ हुआ कि भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह को उसी ज़ुबान में कहना पड़ा कि राजस्थान में भाजपा में नेतृत्त्व कोई मुद्दा नहीं है। बहरहाल, आज भी राजे के हाथों में तुरुप का पत्ता तो है ही। वे पहले ही कह चुकी हैं कि उप-चुनाव और निकाय चुनाव मेरी कमान में लड़े जाते, तो पार्टी की इतनी किरकिरी नहीं होती।

इन चुनावों में पराजय तो भाजपा का खुला घाव है। वसुंधरा राजे को भारी-भरकम लाव-लश्कर और लम्बे-चौड़े कािफले से घिरा देखने के आदी हो चुके लोगों को कभी यह गुमान तक नहीं रहा होगा कि वे गिने-चुने लोगों के बीच तन्हा और गुमनाम शिख्सयत की तरह नज़र आ सकती हैं। इस मंज़र के संकेतों और अन्य-अर्थों को समझें, तो वसुंधरा राजे अपनी ‘साख’ की पूँजी गँवा चुकी हैं। जनता ने भी अपनी बेज़ारी दिखाकर उनकी रुखसती का पर्चा थमा दिया है।

यह मंज़र सरकार परस्त खबरिया चैनलों के गलत साबित होने का सुख भी है, जो सुराज गौरव यात्रा में महारानी के गिर्द उमड़ते सैलाब को देखकर उनकी वापसी के दावों पर मुतमईन थे। इस फरेब का तिलस्म टूटा तो हकीकत चौंकाने वाली थी कि सारा मजमा सरकारी अफसरों और कारिन्दों का था; जो आचार संहिता लगने के बाद गायब थे। राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि राजे की इस कदर फज़ीहत की वजह ‘मेरा वचन ही मेरा शासन’ की सामंती लीक पर हुकूमत करना था और अपने इर्द-गिर्द ताकत बटोरने की इसी अदा ने उनके सामने आईना रख दिया था। विश्लेषकों का कहना है कि यह जनता की अप्रत्यक्ष लताड़ थी, जो उन्हें सत्ता से बाहर करने का रास्ता दिखा रही थी और गवर्नेंस के उस मसौदे को ही नकार रही थी, जो उन्होंने मनमानी के बूते कायम की थी।

सूत्रों की मानें, तो यह एक दिलचस्प हकीकत है कि जब तक लालकृष्ण आडवाणी कद्दावर रहे वसुंधरा राजे निरंकुश बनी रहीं और उन्होंने किसी की परवाह भी नहीं की। नतीजतन भाजपा और संघ में उन्होंने कितने दुश्मन बनाये? इसकी गिनती करना मुश्किल है। तबसे वे किस कदर आँखें तरेरने में माहिर थीं, इससे वे लोग अच्छी तरह वािकफ होंगे, जो उनके गुस्से देख या झेल चुके हैं।

वसुंधरा राजे का चेहरा भले ही पोस्टरों की तरह नहीं है; लेकिन बावजूद इसके उसका वजूद ठीक वैसा ही है और उनकी छवि और रुतबे पर किसी को अवांछित इश्तहार दर्ज करने की इजाज़त नहीं देता। उनके राजनीतिक जीवन का इतिहास बाँच चुके विश्लेषकों का कहना है कि वसुंधरा राजे हथेलियों में राजयोग की गहरी हो चुकी लकीरों को देखने की इस कदर अभ्यस्त हो चुकी हैं कि सियासी इरादो में गैरों की खुदमुख्तारी के ऐलान उन्हें नहीं चौंकाते।

रणनीतिकार उनकी इस मन:स्थिति से कतई दुविधाग्रस्त नहीं हैं। पर सियासतदान ज़रूर टकटकी लगाये हुए हैं कि क्या आने वाले दिनों में वसुंधरा की राजनीतिक हैसियत सिमटकर रह जाएगी? अथवा वे भाजपा नेतृत्त्व को बेचैन करने वाली किसी नयी किस्सागोई की शुरुआत कर देंगी?

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