23 Jun 2019

बैलाडीला खदान विवाद से किसका हो रहा फायदा? :ग्रामसभा नोटिस मामले पर उठापटक जारी:

By EditorTaaza Khabar

दंतेवाड़ा |
बैलाडीला खदान के विवाद से किसका हो रहा फायदा:
ग्रामसभा नोटिस मामले पर उठापटक जारी


किरंदुल: पिछले कई दिनों से एक मामला बार बार तूल पकड़ रहा है। मीडिया की सुर्ख़ियों में छाया हुआ यह मुद्दा न सिर्फ गाँव वालों के लिए बल्कि मामले की तहकीकात कर रहे अधिकारियों के लिए भी मुसीबत बन गया है। हम बात कर रहे हैं बेलाडिला के हिरोली पंचायत की ग्रामसभा की। जिसे लगातार फ़र्ज़ी बताया जा रहा है, मगर आज सी जी उजाला आपको इस मामले के दूसरे पहलु से भी अवगत करायेगा। आपको इस पुरे मामले की हकीकत बताएँगे। सबसे पहले जान लेते है की आखिर मामला है क्या? बेलाडिला के डिपॉज़िट नंबर 13 के निजीकरण को सरकार ने मंजूरी दे दी जिसके बाद इसके विरोध में आदिवासियों ने प्रदर्शन किया जो बाद में आंदोलन का रूप लेने लगा। लगातार एक सप्ताह तक आदिवासियों ने निजीकरण का विरोध किया और कहा कि उस स्थान पर उनके देवता विराजते है इसलिए वे यहाँ खनन नहीं होने दे सकते। इस मामले में राजनितिक पार्टियां भी अपनी अपनी ओर से बयान जारी की है।कई नेता आंदोलन में अपनी सहभागिता देने में भी आगे रहे।


आदिवासियो के इस आंदोलन की चर्चा पुरे राज्य में बनी हुई थी।जिसके बाद बघेल सरकार ने उन्हें मामले की पड़ताल कर न्याय का अस्वासन दिया और उसके बारे में पड़ताल शुरू की। तब आदिवासियों ने सरकार से 2014 में हुई ग्राम सभा की जांच की मांग की और उसे फ़र्ज़ी बताया। साथ ही 15 दिन के अंदर ही इस सभा की सच्चाई सामने लाने का निवेदन किया। इसके बाद सरकार ने इस ग्राम सभा की जांच शुरू की और जब दस्तावेज़ की जांच हुई तो पाया गया की 106 ग्रामीणों ने इसमें हामी भरी थी। दतावेज़ों में जिन 106 ग्रामीणों के नाम और हस्ताक्षर थे उन्हें सरकार ने नोटिस जारी कर 24 जून को हाज़िर होने की हिदायत दी है।

इस पुरे मामले में अगर वाकई खबर के पीछे का सच जानना है तो जिसे ज़रा नज़दीक से समझना होगा। बस्तर के घोर नक्सली क्षेत्र में बैलाडीला का नाम आता है। बेलाडिला छत्तीसगढ़ का हिस्सा है वह हिस्सा जहा नक्सलियों की इजाज़त के बिना तो पत्ता भी नहीं हिल सकता। ऐसे में किसी भी क्षेत्र का विकास उनकी गतिविधियों पर लगाम कस देता है और वह किसी भी बंदिशों में नहीं फसना चाहते इसलिए कही न कहीं यह कहना भी गलत नहीं होगा की यह नक्सलियों की ही चाहत है की क्षेत्र का निजीकरण न हो। क्योंकि किसी भी तरह का विकास उनकी संदिग्ध गतिविधियों पर रोक लगाता है।छत्तीसगढ़ प्रदेश नक्सलवाद की इस बड़ी समस्या से काफी समय से जूझ रहा है।बहुत बड़े पैमाने पर नक्सलियो के आतंक से ग्रामीण भी त्रस्त है।इन क्षेत्रों के रहवासी अपना जनजीवन कैसे जीते होंगे।इसका अनुमान हम सब लगा भी नही सकते है।हर समय जान जोखिम में रखकर हमारी फोर्स के जवान अपने दायित्व का निर्वहन कर रहे है।बस्तर के सुदूर अंचलों में विकास की बेहतरीन व्यवस्था से नक्सलियो का सफाया बहुत जल्द हो सकता है।पर इन क्षेत्रों के विकास को रोकने का काम नक्सली शुरू से करते आ रहे है।आये दिन निर्माणाधीन सड़कों को रोकने की खबरे इन क्षेत्रों से आती रहती है।


और अगर कुछ मीडिया रिपोर्ट्स की माने तो अब वह 106 ग्रामीण भी अपनी सहमति से मुकर रहे है और जिसकी वजह है नक्सलियों का डर। ग्रामीण जो चाहते तो है की क्षेत्र का विकास हो मगर अपनी जान को जोखिम में नहीं डालना चाहते। आखिर कब तक छत्तीसगढ़ इन नक्सलियों के आगे ऐसे ही बेबस खड़ा रहेगा और कब तक विकास को डर के आगे घुटने टेकने होंगे?

सरकार को आदिवासियो के हित पर सुचारू रूप से विचार करने की आवश्यकता है।बैलाडीला मामले को नया रंग देकर कही न कही आदिवासियो के अहित पर काम करा जा रहा है।इन क्षेत्रो में विकास के आने से यहाँ रहने वाले आदिवासी भाइयो का भी विकास होगा।प्रदेश सरकार अपनी ओर से पुरजोर तरीके से इन क्षेत्रों के विकास को लेकर संकल्पबद्ध तो नजर आती ही है।पर व्यवस्थित तरीके को अपनाने की आवश्यकता है।

रिपोर्ट
के जी दिनेश
दंतेवाड़ा/ जगदलपुर

Tag :

Search News

Subscribe our News

Total Visits

2,103,537